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सभी धर्मो का सार

अतुल विनोद:
लगभग सभी धर्म के अवतार महापुरुष या साधु संत आखिर में एक बात तो मानते हैं कि इस सृष्टि का नियंता एक ही ईश्वर है| चाहे वह इस्लाम हो, हिंदुत्व हो, बुद्धिज्म हो या ईसाइयत हो| सबके अवतारों ने उस परमात्मा की राह पर चलने का संदेश दिया| यानी यह सभी आवतार स्वयं परमात्मा नहीं थे बल्कि इन्होंने उस परमपिता की तरफ इशारा किया| परम यानी उसके आगे और कुछ नहीं हो सकता, सभी धर्म कम से कम एक बात पर तो एक मत है कि हम सबका मालिक एक ही परम पिता है|
सभी धर्म एक और बात कहते हैं कि हम सबको सत्य की राह पर चलना चाहिए हालांकि सभी धर्मों के प्रणेता सत्य का अपने अपने स्तर पर वर्णन भी करते हैं| फिर भी सब इस बात पर एकमत है कि मनुष्य को सत्य की राह पर चलना चाहिए यह अलग बात है कि वह सत्य आखिर है क्या?
लगभग सभी धर्म मनुष्य को अपने अंदर उस परम तत्व को महसूस करने की आवश्यकता पर जोर देते हैं|
सब इस बात पर एकमत है कि हम सबके अंदर उस परमात्मा का तत्व मौजूद है|
सभी धर्म मानव जाति को मानव जाति के कल्याण सेवा और एक दूसरे की सहायता करने का संदेश देते हैं|
सभी धर्म प्रकृति को परमात्मा का स्वरूप मानते हैं और प्रकृति के संरक्षण पर जोर देते हैं|
सभी धर्म इस बात पर एकमत है कि मानव को हिंसा से दूर रहना चाहिए|
एक दूसरे की बुराई नहीं करनी चाहिए|
दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए और ईमानदारी के रास्ते अपनी आजीविका चलानी चाहिए|
सभी धर्म बुराइयों से दूर रहने की सलाह देते हैं सभी धर्म कहते हैं कि जगत के कल्याण के लिए इंसान को कोशिशें करते रहना चाहिए|
सभी धर्म एक बात पर एक मत है कि मनुष्य को अपने कर्म का फल भुगतना ही पड़ता है मनुष्य आज जो भी कुछ है वह उसके कर्मों के कारण है|
सभी धर्म ईश्वर की न्याय व्यवस्था पर यकीन करते हैं| सबका मानना है कि ईश्वर न्यायाधीश है और वह सब को उनके कर्मों के हिसाब से सही परिणाम देता है, ईश्वर किसी के साथ भेदभाव नहीं करता, उसके न्याय में देरी हो सकती है लेकिन गलती नहीं|
सभी धर्म मानते हैं कि परमात्मा ईश्वर, ख़ुदा, अल्लाह एक है| और वह सबसे शक्तिशाली है| उसी ने इस दुनिया की रचना की है| उसी पर सब कुछ आधारित है| उसके समान कोई नहीं है| और हम सबको उसकी पूजा करनी चाहिए| सभी धर्म यह भी कहते हैं कि वह परमपिता महान है| वह सबको बराबर प्रेम करता है| वह सब का संरक्षक है|
चाहे इस्लाम हो या हिंदुत्व, एक बात मानते हैं कि सभी मनुष्य एक ही पिता की संतान हैं|
इस लिंक पर मेरा ये पूरा आर्टिकल पढ़ें
इस विषय पर और विस्तार से चर्चा करते हैं|
आधुनिक काल में हम कई धर्म पाते हैं। विविध धर्मों के नामों को देखने पर ही लग सकता है कि एक धर्म दूसरे धर्म का बिल्कुल विरोधी है। इन्हें विरोधी समझने का कारण ये भी होता है कि संस्थापक अलग-अलग स्थानों में और अलग-अलग कालों में उत्पन्न हो उदाहरण के लिये हिन्दू धर्म बहुत पुराना है, ईसाई धर्म लगभग 2000 वर्ष पहले आरंभ किया गया. मुस्लिम धर्म का उदय ईसाई धर्म के काफी समय बाद हुआ। इसलिए स्वाभाविक है कि ये सभी धर्म एक दूसरे के विरोधी है,या कम से कम उनमें किसी प्रकार एकता नहीं पाई जाती। पर यदि हम इन सभी धर्मों को उनके मूल तथा पवित्र रूप में देखें हम यह पाते हैं कि उनमें समानताएं हैं -
  1. सभी बड़े धर्म ईश्वर को मानते हैं और पवित्र जीवन को महत्व देते हैं। ऐसे धमों में भी जिनमें शुरू में ईश्वर को मान्यता नहीं दी गई थी, बाद में उनके संस्थापकों को ईश्वर का पद दे दिया गया । उदाहरण के लिए, बौद्ध धर्म में बुद्ध को ईश्वर समझकर पूजा का विषय बनाया गया है इसी तरह जैन धर्म में महावीर की पूजा की जाने लगी। इसलिये हम कह सकते हैं कि सभी धर्म किसी न किसी रूप में ईश्वर को स्वीकार करते हैं। यही नहीं सभी धर्म किसी न किसी रूप में मूर्ति पूजक भी हैं।
  2. प्रत्येक धर्म का यह विश्वास है कि ईश्वर एक है और उसी ने जगत् का निर्माण किया है। यह जगत् इस तरह की कृति नहीं है, जिसका निर्माण एक से अधिक ईश्वरों ने किया हो। सभी धर्म यह मानते हैं कि ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए सही प्रकार का नैतिक जीवन बिताना आवश्यक है। जो व्यक्ति अन्य लोगों पर अत्याचार करते हैं, या उनका शोषण करते हैं, या उनके साथ भेदभाव का व्यवहार करते हैं या जो लोग छलकपट के द्वारा लोगों को ठगते हैं, ईश्वर उनसे घृणा करता है। ईश्वर ऐसे लोगों कभी स्वीकार नहीं करता, बल्कि उन्हें दंडित करता है। इसलिए प्रत्येक धर्म अत्यन्त उन्नत प्रकार का नैतिक जीवन बिताने की शिक्षा देता है। वह प्रत्येक अनुयायी को सांसारिक भोगों से दूर रहने की प्रेरणा देता है। ईमानदारी, सच्चाई ईश्वर के प्रति प्रेम.सभी लोगों से स्नेह आदि की शिक्षा प्रत्येक धर्म देता है।
4. सभी धर्म अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णु होने का उपदेश देते हैं, अर्थात् कोई भी धर्म वास्तव में यह नहीं कहता कि अन्य धर्मो को नहीं माना जाये, बल्कि वह इस बात का आप्रह करता है कि सभी धर्मों के प्रति सद्भावना रखी जानी चाहिये । सभी धर्म अन्ततः एक ही ईश्वर की उपासना करते हैं, क्योंकि ईश्वर एक ही है और उसी ने सभी मनुष्यों का निर्माण किया है । इसलिये सभी मनुष्य भाई भाई हैं और उन्हें सभी लोगों के कल्याण के लिए कार्य करना चाहिए। इसलिए तुलसीदास कहते हैं "परहित सरिस धर्म नहीं भाई । " सभी धर्म वास्तव में ईश्वर को प्राप्त करने के भिन्न भिन्न मार्ग हैं। अन्तिम उद्देश्य तो एक ही ईश्वर को प्राप्त करना है।सभी धर्म ईश्वर को सत्यं शिवं और सुन्दरम के रूप में देखते हैं। सभी धर्मों के अनुसार, ईश्वर ही एकमात्र सत्य है; वह पूर्णतया कल्याणकारी है और अप्रतिम सौन्दर्य से युक्त है।
5. सभी धर्मों में रूढ़िवादिता का अंश भी पाया जाता है। जब व्यक्ति ईश्वर की आराधना प्रारंभ करता है तो वह मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर आदि का आश्रय लेता है। फिर जैसे-जैसे उसकी साधना का विकास होता है.वह आगे बढ़ता जाता है और रूढ़ियों को पीछे छोड़ देता है। अंत में वह ईश्वर के नि र्गुण निराकार रूप को प्राप्त कर लेता है। मगर प्रारंभिक दौर में प्रत्येक साधक को किसी न किसी रूप में किसी मन्दिर, मस्जिद आदि का सहारा जरूर लेना पड़ता है। क्योंकि प्रत्येक धर्म में प्रारंभिक दौर में रूढ़ियों का अंश पाया जाता है, इसलिये इन रूढ़ियों के कारण ऊपर से देखने पर सभी धर्म अलग-अलग नजर आते हैं। पर साधना के विकास से रूढ़ियों का अंश खत्म हो जाता है और व्यक्ति इस एकता को समझ लेता है जो सभी धर्मों में विद्यमान है।
6. यदि हम सही ढंग से सोचें, तो हमें यह पता चलता है कि प्रचलित धर्म एक व्यक्तिगत साधना है। इस साधना का उद्देश्य परम सत्य से सम्पर्क कायम करना होता है । इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने ढंग से ईश्वर से संपर्क कायम कर सकता है। यह ज़रूरी नहीं है कि वह अपने साधना के पक्ष को सबके सामने सही ढंग से प्रस्तुत करने में सफल हो । इसलिए धार्मिक भावना अंत में रहस्यवाद के रूप में प्रगट होती है। इस रहस्यवाद के स्वरूप को केवल वही व्यक्ति जानता है जिसने ईश्वर से संबंध स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली है। अन्य लोगों के लिए यह पाखण्ड की वस्तु भी हो सकती है। पर लोगों के इस मत से व्यक्ति की साधना का महत्व कम नहीं होता। धर्म का सर्वोच्च रूप तो यह अनुभूति ही है। इस तरह हम देखते हैं कि धर्म वास्तव में लोगों को अलग करने वाली वस्तु नहीं है।
7. वह लोगों को जोड़ने वाली वस्तु कही जा सकती है। इसीलिए स्वामी विवेकानंद का कथन है कि मैं सभी धर्मों के प्रति सहिष्णु हूँ यह कहना गलत है,मैं तो सभी धर्मों को स्वीकार करता हूँ क्योंकि सभी धर्म मूल रूप में एक हैं; वे सभी एक ही ईश्वर को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। रामकृष्ण परमहंस का कथन है कि जिस तरह नदी के किनारे अनेक घाट होते हैं और प्रत्येक घाट का अलग-अलग नाम होता है, उसी तरह ईश्वर को लोगों ने अलग-अलग नाम दे दिये हैं। जिस तरह घाटों के अलग-अलग नाम देने से नदी अलग-अलग नहीं हो जाती, उसी तरह प्रत्येक धर्म के अलग-अलग नाम से धर्म अलग नहीं होता। रामकृष्ण परमहंस ने मुस्लिम और ईसाई बनकर भी इस बात का अनुभव किया कि वास्तव में परम तत्व अलग-अलग नहीं है। परम तत्व को सही रूप के विषय में सही ज्ञान न होने के कारण लोग उसे गलत समझ लेते हैं, और धर्म में भिन्नता देखते हैं। वास्तव में धर्म एक ही है। पर यह व्यक्ति की अपनी रुचि और इच्छा है कि वह धर्म को किस रूप में स्वीकार करे। यदि व्यक्ति वास्तविक रूप से साधना करे तो अंत में वह उस एकता को प्राप्त कर सकता है जो धर्म का सही रूप है। जिस
तरह सभी नदियाँ समुद्र में ही पहुँचती हैं, उसी तरह सभी धर्म (संप्रदाय नही) एक ही ईश्वर तक पहुंचते हैं। विविधता मानवीय संसार की एक ऐसी विशेषता है जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता। भाषा, संस्कृति, साहित्य, विचार, रुचि सभी क्षेत्रों में अनेकरूपता नजर आती है