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माया या भ्रम

P ATUL VINOD

माया को लेकर भी अनेक तरह के भ्रम हैं| कहते हैं “ब्रम्ह सत्यम जगत मिथ्या” यहाँ जगत को मिथ्या या माया कहा गया है, लेकिन यहाँ दिखने वाले जगत को माया नहीं कहा गया है? माया और मिथ्या का अर्थ है मानव द्वारा निर्मित असत्य का जाल जो अज्ञान का जगत वो अपने मन में बनता है वह माया या मिथ्या है| जो दिखाई दे रहा है वह संसार है, संसार माया नहीं है, शरीर माया नहीं है लेकिन शरीर को ही सब कुछ मान लेना माया है| माया हमारी बुद्धि का भ्रम है , माया का अर्थ है अज्ञानता, माया का अर्थ है सच को झूठ और झूठ को सच मान लेना |
माया है अस्तित्व के किसी एक तल को ही सच मान लेना और दुसरे तलों को दरकिनार कर देना| आध्यात्मिक सत्ता को दरकिनार कर देना और भौतिक सत्ता को सब कुछ मान लेना या आध्यात्मिक सत्ता को ही सब कुछ मान लेना और भौतिक सत्ता को दरकिनार कर देना|
आत्मा के बिना शरीर और शरीर के बिना आत्मा अधूरी है| शरीर भी तीन प्रकार के हैं| स्थूल,सूक्ष्म और कारण| बिजली में कितनी ही ताकत हो लेकिन तार के बिना वह प्रवाहित नहीं हो सकती तो बिजली भी महत्वपूर्ण है और तार भी|
भारतीय दर्शन में अध्यात्मिक अस्तित्व को ज्यादा महत्व दिया गया है क्यूंकि ये चिर स्थाई है| स्थूल शरीर चुकी एक समय तक ही रहता है इसीलिए उसे अस्थाई मन जाता है| आध्यात्मिक ह्रदय को खोलने के लिए हमें अज्ञानता, इच्छाओं, कर्म बंधनों, वासना और संस्कारों के जाल से मुक्ति पानी पड़ेगी और यह अध्यात्मिक शक्ति (कुंडलिनी) से ही प्राप्त होता है |
इस संसार में जो भौतिक सत्ता है वह लगातार नष्ट होती रहती है और बनती रहती है लेकिन आध्यात्मिक सत्ता हमेशा बरकरार रहती है |
हमारे अस्तित्व के दो प्रमुख स्तर हैं, भौतिक(lower reality)जिसमे हम जीते हैं| दूसरा अध्यात्मिक जिसे हम चेतना का उच्च स्तर (higher reality) कहते हैं| ध्यान ,योग ,साधना, तप, उपासना व अभ्यास के ज़रिये हम उच्च स्तर को हासिल करना चाहिए यही माया से मुक्ति है|