संस्कार और प्रारब्ध ही गति का कारण है, परिणाम के पीछे कोई न कोई कारण मौजूद होता है। किसी के कुछ होने या बनने में कर्म के साथ संस्कार और प्रारब्ध का हिस्सा होता है। योगी कहलाना और योगस्थ हो जाना दोनों में अंतर है जो योगस्थ हो गया फिर भोगस्थ नही हो सकता। योग साधन के दौरान चित्त शक्ति संस्कारों को मिटाना शुरू करती है लेकिन प्रारब्ध के प्रबल होने पर और संकल्प के कमजोर होने से योगी अवसर मिलने पर पुनः भोग में प्रवत्त हो सकता है ।
