मूल रूप से जिस जीवन को हम इतनी गंभीरता से जीते हैं वह परमात्मा के विलास का एक हिस्सा मात्र है| भारतीय दर्शन और वैदिक ज्ञान कहता है कि यह संसार परमात्मा के विलास(मनोरंजन की चाह) की परिणिति है| सृष्टि के आरंभ में परमात्मा एक था और उसकी बहुत हो जाने की इच्छा हुई| इसी इच्छा से सृष्टि का आरंभ हुआ| यूनिवर्स, आकाशगंगायें, सौर मंडल और गृह, नक्षत्र, तारे बने, धीरे-धीरे जीवन की उत्पत्ति हुई|
हम सब परमात्मा की तरह एक रोमांचकारी मनोरंजक यात्रा पर हैं| भारतीय दर्शन मानता है कि भौतिक जीवन एक मनोरंजक खेल है, हम सब उस परमात्मा के रंगमंच के अभिनेता हैं | भले ही हम छोटे-छोटे सुख दुख रुपी खिलोनों में उलझे हुए हैं, लेकिन हमारा वास्तविक उद्देश्य उस चिरस्थाई मनोरंजन की प्राप्ति करना है| जो परमात्मा का स्वभाव है| परमात्मा, हमेशा आनंद में रहता है|
इस दुनिया में दुखी और पापी लोगों की जमात है, तो सुखी और आनंदित लोगों की भीड़ भी है| परमात्मा की नदी इन दोनों के बीच से होकर गुजरती है| वह हर एक को जीने की अनुमति देता है पापियों को भी वह छोड़ता नहीं है क्यूंकि वो जानता है सब कुछ उसका ही खेल है| वह निरंतर बहने वाली सृजनात्मक शक्ति है| उस परम शक्ति के परम आनंद से परिचित होना साधना का लक्ष्य है|
साधना का कभी अंत नहीं होता, जीवन की यात्रा की निरंतरता भी साधना है| अपने कर्मों पर अडिग रहना, ईश्वर द्वारा प्रदत्त भूमिका का सही निर्वाह(अपना रोल सही ढंग से निभाना) भी साधना है| एक ज़िम्मेदारी(भूमिका) पूरी होती है तो दूसरी शुरू, इश्वर भी निरंतर जुटा हुआ है|
हम सब मनुष्य हैं और उस परमात्मा के विलास यानि आनंद के लिए पैदा हुयी सृष्टि का हिसा हैं| सवाल ये है कि साधारण मनुष्य अपने जीवन में किस स्तर का मनोरंजन चाहता है? उसकी खोज गाड़ी, बंगला, पद या पैसे तक सीमित है लेकिन जिसकी चेतना विकसित हो जाती है उसे इन सांसारिक खिलोनो से तृप्ति नहीं मिलती| इसलिए वह असली मनोरंजन की तलाश करता है| अंततः मानव की साधना रुपी जिद को पूरी करने के लिए परमात्मा को उसे असली आनंदरूप परमतत्व से परिचित कराना पड़ता है| ये वो खिलौना है जिसे देखते ही मनुष्य अनंत चिर-आनंद की झलक पा जाता है, एक बार जिसने असली रंग देख लिया उसे नकली रंग फीके लगने लगते हैं, इसका ये मतलब नहीं कि वो परम रंग में हमेशा के लिए डूब गया न ही वह अनंत आनंद का भागिदार हो गया, अभी तो वह भौतिक, सूक्ष्म और कारण शरीर से घिरे होने के कारण सीमित है तो सिर्फ उसे सीमति टेस्ट ही मिलेगा| हलाकि उस आनंद की झलक ही इस जीवन को अच्छे से काटने के लिए काफी है| इस अवस्था में, उसका बच्चों की तरह छोटी छोटी बात पर रोना झींकना बंद हो जाता है|
निरंतर आपने कर्म के साथ असली आनंद की प्राप्ति के लिए योग मार्ग पर चलता हुआ मनुष्य एक जन्म में इतना योग्य हो जाता है कि उसकी आत्मा, मृत्यु के बाद शरीर छोड़कर (सूक्ष्म व कारण शरीर के साथ) अद्रश्य जगत में उच्च लोक प्राप्त करती है|
अद्रश्य उच्च लोक में भी यदि उसकी साधना चलती रहे तो वो "सूक्ष्म" शरीर छोड़कर, "कारण" शरीर के साथ और अधिक विकसित अद्रश्य जगत में प्रवेश करती है| जिसे स्वर्ग लोक कहते हैं| यदि स्वर्ग या उच्च कारण भाव जगत के खेल भी आत्मा को प्रभावित न करें तो वह "कारण" शरीर भी छोड़ देती है| इसके बाद आत्मा ऐसे जगत में प्रवेश करती है जहाँ विशुद्ध ब्रम्हतत्व ही हिलोरें लेता रहता है| इस परम आनंद के सागर में डूबकर वह हमेशा हमेशा के लिए उस अनंत समुद्र का हिस्सा बन जाती है| इसी को मोक्ष कहते हैं
