हे अर्जुन जिस प्रकार नागिनका कुंकुमके समान लाल बच्चा कुंडली बनाकर बैठता है, उसी प्रकार यह कुंडलिनी नामक छोटी नाड़ी साढ़े तीन फेरेकी कुंडली मारकर और सिर नीचे करके नागिनकी तरह सोई रहती है। विद्युत्के बने हुए कंकण या अग्निकी ज्यालाकी रेखा या सोनेके बढ़िया घोंटे हुए पसिकी तरह यह कुंडलिनी नाभिस्थानकी छोटी सी जगहमें अच्छी तरह बन्धनोंसे जकड़ी हुई पड़ी रहती है। पर जब उसपर वज्रासनका दबाव पड़ा है, तब वह जाग उठती है। फिर जिस प्रकार कोई तारा टूट पड़ता है अथवा सूर्यका बासन छूट जाता है अथवा स्वयं तेजका बीज प्रस्फुटित होने पर उसमेंसे कोमल गाभ निकलता है, उसी प्रकार यह कुंडलिनी अपना घेरा छोड़ देती है और मानों अँगड़ाई लेती हुई नाभि-कम्य पर खड़ी हो जाती है। स्वभावतः वह बहुत दिनोंकी भूखी रहती है, तिस पर वह दबाकर जगाई जाती है; इसलिए वह अपना मुख बड़े आवेशसे खोलकर ऊपर उठाती हैं। उसी समय उसे अपने सामने वह अपान वायु
मिल जाती है जो हृदय-कोश तलमें बाकर एकत्र हुई रहती है; और तब वह उस समस्त वायुको अपने अधिकारसे कर लेती है। अपने मुखकी ज्वालासे वह उसे ऊपर-नीचे और चारो बोरसे घेर लेती है और मांसके कौर खाने लगती है। जहाँ जहाँ मांस रहता है, वहाँ वहाँ पहुंचकर वह उसे खाने लगती है बौर अन्तमें हृदयके भी एक दो कौर वह चट कर जाती है। फिर वह पैरोके तलुओं और हाथोंकी हथेलियोंकी भी खबर लेती है और तब ऊपरके अंश पर भी हाथ साफ करती है। इस प्रकार वह शरीरकी प्रत्येक सन्धि और प्रत्येक अंगकी तलाशी लिये बिना नहीं रहती। वह नीचेके भागोंको भी नहीं छोड़ती । यहाँ तक कि नाखूनोंका सार भी बह चूस लेती है; चमड़े तकका सत्व निकाल लेती है और तब हड्डियों पर जा पहुँचती है। वह हड्डियोंकी नलियों तकका रस चूस लेती है, शिरामोंके जाल तक साफ कर डालती है, और इन सब बातोंका परिणाम यह होता है कि बाहरकी ओरके रोम-कूप तक बन्द हो जाते हैं। कुंडलिनीको बहुत अधिक प्यास लगी रहती है, इसलिए रुधिर आदि सातों धातुओंको वह एक ही घंटमें पी जाती है और इस कारण शरीर बिल्कुल नीरस हो जाता है, जिससे शरीरमें पूर्ण रूपसे ग्रीष्म ऋतु ही व्याप्त हो जाती है। फिर नाकके छेदोंमेंसे बारह अंगुल तक जो हवा निकलती है, उसे भी यह कुंडलिनी पकड़कर अन्दरकी ओर खींचने लगती है। ऐसी अवस्थामें नीचेकी वायु ऊपरकी ओर खिचने लगती है और ऊपरकी वायु नीचेकी ओर दबने लगती है; और इन दोनोंके बीचमें केवल मध्यवाले चक्रके परदेको हो बाड़ रह जाती है। यदि बीच में यह आड़ न हो तो ये दोनों वायु उसी समय एक दूसरीसे मिल जायें। परन्तु कुंडलिनी कुछ व्यग्र होकर इनसे कहती है- 'क्या केवल तुम्हीं दोनों अब तक बच रही हो ?' हे अर्जुन, इसका अभिप्राय यह है कि यह कुंडलिनी शरीरमेंका पृथ्वीवाला अंश खाकर भी समाप्त कर डालती है और जलके अंशका तो वह कहीं नाम भी नहीं रहने देती। जब यह शरीरमेषे पृथ्वी और जल दोनों ही भूतोंको ला डालती है, तब यह पूर्ण रूपसे तृप्त हो जाती है और तब कुछ शान्त होकर सुषुम्ना नामक नाड़ीके पास रहती है। वहां तृप्त और सन्तुष्ट होकर वह जो गरल या विष उगलती है, वहीं प्राण-बायुके लिए अमृतके समान हो जाता है; और उस नभूतसे प्राण-वायु जीवन धारण करती है यद्यपि वह प्राण-वायु उस गरलकी अग्निमेंसे निकलती है, परन्तु फिर भी वह शरीरके भीतरी और बाहरी दोनों पाश्वं शीतल कर देती है; और तब वह प्रत्येक अंगमें फिरसे वह सामध्यें भरने लगती है जो वह पहले उनमेसे खींच चुकी होली है। परन्तु नाड़ियोंके मार्ग भर चुके होते हैं और उनका प्रवाह बन्द हो चुका रहता है; और शरीरमें जो अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कुकर, देवदत्त और धनंजय नामक नौ प्रकारकी वायु नष्ट हो चुकी होती हैं और केवल प्राण-वायु हो बच्ची रहती है, इसलिए शरीरके सब धर्म नष्ट हो जाते हैं। फिर नाकके दाहिने और बाएँ रन्ध्रोंकी इड़ा और पिगला नामकी नाड़ियाँ मिलकर एक हो जाती हैं, उनकी तीनों गाँठें खुल जाती हैं और शरीरके अन्दरके छनो चक्रोंके ऊपरके आवरण फट जाते हैं। फिर नायिका- रन्धोंमेंसे बहनेवाली जिन वायुओंकी उपमा सूर्य और चन्द्रमासे दी जाती है, उनका ऐसा लोप हो जाता है कि दीपककी ज्योतिको भी वे नहीं हिला सकतीं। बुद्धिकी चंचलता नष्ट हो जाती है और घ्राणेन्द्रियमें जो गन्ध बची रहती है, वह भी कुंडलिनी शक्तिके साथ साथ मध्यम नाड़ी अर्थात् सुषुम्नामें घुस जाती है। इसी बीचमें चन्द्रमाको सत्रहवीं कलाके अमृतका वह सरोवर, जो ऊपरकी ओर रहता है धीरे धीरे टेढ़ा होने लगता है और आकर कुंडलिनीके मुँहके साथ लग जाता है। फिर इस कू'डलिनी की नलीमें जो अमृत रस भरता है, वह समस्त अंगोंमें व्याप्त हो जाता है और प्राण-वायुके साथ प्रत्येक अंगमें पहुँचकर जहाँका तहाँ सूख जाता है। जिस प्रकार साँचेको तपानेसे उसमेंका सारा मोम उड़ जाता है और फिर वह साँचा केवल धातु-रसखे भरा रहता है, उसी प्रकार मानों चन्द्रमाकी सत्रहवीं कला इस शरीरके रूपमें अवतरित होती हुई जान पड़ती है और उसके चारो बोर चमड़ेका अवगुण्ठन मात्र रह जाता है। बादलोंके आगे का जानेसे सूर्य छिप जाता है; परन्तु उन बादलोंक हट जाने पर जिस प्रकार वह फिर अपनी प्रकाशमान प्रभासे प्रकट होता है, उसी प्रकार इसी सत्रहवी कलाके तेजस्वी रूप पर चमड़ेकी खोली ही ऊपर ऊपर रह जाती है। परन्तु फिर वह भी भूसीकी तरह भड़ जाती है। फिर अंगोंकी कान्ति या प्रभा ऐसी जान पड़ती है कि मानों शुद्ध स्फटिकका निर्दोष स्वरूप हो अथवा रत्नका बीज प्रस्फुटित हुना हो और उसमें कोमल कल्ले निकले हों। अथवा ऐसा जान पड़ने लगता है कि सन्ध्या-कालका रंग लेकर यह शरीर बनाया गया है अथवा अन्तस्थ चैतन्यके तेजकी निर्मल प्रभा है। यह शरीर ऐसा जान पड़ता है कि मनों से भरा हुआा अथवा चैतन्य रससे डाला गया है । मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि वह शरीर करा है, मूत्तिमती शान्ति ही है। यह शरीर मानों अस्मन्द-चित्रमें के रंगोंका काम अथवा श्रात्म-तुरका स्वरूप दिखाई ढ़िता है अथवा सन्तोषका वृक्ष दृढतापूर्वक रोपा हुआ जान पड़ता है। अथवा वह स्वयम्पकको कली है अथवा अमृतका पुतला है अथवा कोमल ऐना उपवन है जिसमें पूर्ण रूपसे व मन्त ऋतु व्याप्त है। अथवा शरद् ऋनकी आइत से चन्द्र-विम्ब पल्लवित हुआ है; अथवा यह कल्पना होती है कि स्वयं तेज ही धारण करके बासन पर बैठा हुआ है। जिस समय कुंडलिनी सत्रह्वीं कलाके अमृतका पान करती है, उस समय शरीरकी इसो प्रकारकी अवस्था हो जाती है। उस समय स्वयं काल भी इस शरीरसे डरने लगता है। उस समय वृद्धावस्थाको कलाका लोप हो जाता है, यौवनावस्था भी दब जाती है और फिरसे बाल्यावस्था प्राप्त होती है। यदि केवल वयसका विचार किया जाय तब तो वह बालकोंके ही समान दिखाई पड़ता है; परन्तु उसकी सामर्थ्यका महत्व इतना अधिक होता है कि "बाल" शब्दका अर्थ "बल" ही करना पड़ता है। उस समय उसके जो नये तेजस्वी नख निकलते हैं, उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है कि मानो स्वर्ण वृक्षमें रत्नकी ऐसी कली निकली है जो कभी कुम्हलानेवाली न हो। जो नये दाँत निकलते हैं, वे भी बहुत हो छोटे छोटे होते हैं; और ऐसा जान पड़ता है कि मानों जबड़ेमें दोनों तरफ होरेको कनीकी पंक्तियाँ बैठाई हुई हों। समस्त शरीर पर केशोंके ऐसे नये अग्र भाग दिखाई पड़ते हैं कि मानों बहुत ही बारीक मानिककी कनियोंके समान हों। हाथोंकी हथेलियाँ और पैरोंके तलुए लाल कमलके समान सुन्दर जान पड़ते हैं और उसकी जो आँखें घुलकर निर्मल हो जाती हैं, भला उनका वर्णन कौन कर सकता है ! जिस समय मोती अपनी पक्व दशाको प्राप्त होता है, उस समय वह सीपीमें नहीं समाता। उस समय सीपीकी सीवन जिस प्रकार खुल जाती है, उसी प्रकार उसकी दृष्टि भी आँखोंकी पलकोंमें नहीं समाती और आवेशसे बाहर निकलना चाहती है। जिस समय उसकी आँखें बघखुली रहती हैं, उस स्थितिमें वह समस्त आकाणको आच्छादित कर सकती हैं। हे अर्जुन, तुम यह बात ध्यानमें रखो कि योगोका शरीर यद्यपि कान्तिके विचारसे सोनेका होता है, तो भो भारके विचारसे बह बायुका ही होता है; और इसका कारण यह है कि उसमें पृथ्वीका जड़ अंश और जल का द्रव अंश नामको भी नहीं होता। फिर उस योगी को समुद्रके उस पार की चीजें भी दिखाई पड़ने लगती हैं; स्वर्ग का नाद भी सुनाई पढ़ने लगता है और वह च्यूटी के मन का भाव भी जान सकता है। वह हवाके घोड़े पर सवार होता है; और यदि वह पानी के ऊपर चले तो उसके पैर का पानी से स्पर्श भी नहीं होता । बस इसी प्रकारकी बनेक सिद्धियाँ उसे प्राप्त हो जाती हैं। हे पार्थ, अब तुम इधर ध्यान दी। प्राण-बायु का आधार नेकर हृदय-कोण के तलों को सीढ़ियों के डंडे बनाकर और सुषुम्ना नामक मध्यम नाड़ी की सीड़ी बनाकर जो कुंडलिनी हृदय तक पहुँच जाती है उसे जगत को जननी ही समभना चाहिए। वही जीवात्मा की शोभा है और वही ओंकारके अंकुर के ऊपरकी छाया हैं। वही शून्यकी बैठक और परमात्मा रूपी शिव प्रतिमा का सम्पुट है अथवा बोंकार की स्पष्ट जन्म-भूमि ही है। अस्तु । जब इस प्रकारको यह सुकुमार कुंडलिनी हृदग कोशमें प्रवेश करती है, तब आपसे आप होने वाला दिव्य-अनाहत ध्वनि का नाद उठने लगता है। कुंडलिनी शक्ति के अंग में लगे रहने के कारण हो बुद्धि को चैतन्य प्राप्त होता है, इसलिए यह अनाहत नाद उसे थोड़ा-थोड़ा सुनाई पड़ने लगता है। इस अनाहत नाद के दस प्रकार होते हैं। उनमेसे नादका पहला प्रकार घोष है जो पहले सुनाई पड़ता है। फिर उसी घोषके कुण्डमें ओंकारके रूपके समान अंकित नाद- चित्रकी आकृति बनने लगती है। ये सब बातें कल्पनासे हो जाननी चाहिए। लेकिन कल्पना करनेवालेको भी भला यह बात कैसे मालुम हो सकती है? सच तो यह है कि यही समझमें नहीं आता कि उस स्थान पर काहेका नाद हो रहा है। परन्तु, हे अर्जुन, इस वर्णनके फेरमें तो में बिलकुल भूल ही गया। जब तक प्राण-वायुका नाश नहीं होता, तब तक हृदय रूपी आकाशमें आवाज होती ही रहती है और वही भावाज इस तरह गूँजती रहती है। जब उस अनाहतके मेघनादसे समस्त हृदयाकाश गूँज उठता- है, तब ब्रह्म-रन्धकी खिड़की आपसे बाप खुल जाती है। हे अर्जुन, हृदयाकाशके ऊपर जो महदाकाश अथवा ब्रह्म-रन्ध होता है, उसीमें चैतन्य निराधार स्थितिमें रहता है। ज्योंही उस महदाकाशके घरमें कुंडलिनी देवीका प्रवेश होता है, त्योंही वह अपना तेज उस चैतन्यके आगे भोजन-रूपमें अर्पित करती है। ज्योंही बुद्धिके शाकके साथ इस शुद्ध भोजनका नैवेद्य लगता है, त्योंही फिर द्वैतका कहीं नाम भी बाकी नहीं रह जाता । फिर कु ंडलिनीकी निजी कान्ति नष्ट हो जाती है और तब वह केवल प्राण-वायुका स्वरूप प्राप्त कर लेती है। यदि तुम यह पूछो कि उस समय उसका स्वरूप कैसा हो जाता है तो मैं बतलाता हूँ, सुनो। ऐसा जान पड़ता है कि अब तक वायु की यह पुतली सुनहला पीताम्बर पहने हुए थी, पर अब वह अपना वह पीताम्बर दूर करके नग्न हो गई है। अथवा ऐसा जान पड़ता है कि हवाका झोंका लगनेके कारण दीपककी ज्योति बुझ गई है। अथवा जिस प्रकार बिजली एक बार आकाशमें चमककर अदृश्य हो जाती है, उसी प्रकार जान पड़ता है कि हृदय-कमल तक सोनेकी सलाईके समान दिखाई पड़ने- बाली अथवा प्रकाणके स्रोतकी तरह बहती हुई वह कु ंडलिनी हृदय-प्रान्तकी दरीमें अचानक समा जाती है, और तुरन्त ही शक्तिका शक्तिमें लय हो जाता है। ऐसी अवस्थामें हम उसे भले ही शक्ति कह लें, परन्तु यदि वास्तविक दृष्टिसे देखा जाय तो वह प्राण-वायु ही होती है। भेद केवल यही है कि उसका नाद, कान्ति और तेज दिखाई नहीं पड़ता। फिर उस अवस्थामें मनको जीतने, वायुको बन्द करने या रोकने अथवा ध्यान लगानेकी भी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। उस समय मनमें संकल्प- विकल्प भी नहीं उठते । बास्तवमें इस स्थितिको पंचमहाभूतोंको पूर्ण रूपसे नष्ट करनेवाली ही समभना चाहिए ।" इस प्रकार योग-साधनके द्वारा पिंडसे पिडको ग्रसना, नाथ- सम्प्रदायका रहस्य या मूल उपाय है; और यहाँ श्रीकृष्णने उसकी ओर केवल संकेत "हे अर्जुन, नाश हो जाता है और तब वह
किया है। यहाँ अच्छे अच्छे गुण-ग्राहक कथा श्रवण करनेके लिए बैठे है और इसी लिए श्रीकृष्णको ध्वनितार्थ-वाली गठरीको छोड़कर मैंने वास्तविक भावार्षकी तह ही खोलकर सब लोगों के सामने रख दी है।
इस प्रकार शाश्वत आत्मा को संलग्न करके नियंत्रित मन से योग का अभ्यास किया जाता है।
वह मुझमें स्थापित शांति, निर्वाण की सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त करता है। सुनना। जब शक्ति क्षीण हो जाती है तो सांसारिक लोगों की दृष्टि में शरीर का स्वरूप भी वास्तविक होता है
स्थित्ति या स्वरूपमें नहीं दिखाई पड़ता। साधारणतः ऊपरसे देखने में तो वह पहलेकी
ही तरह शरीरधारी दिखाई पड़ता है, परन्तु बास्तवमें उसका वह शरीर मानों वायुका
ही बना हुआ होता है। अथवा जिस प्रकार अपना ऊपरी छिलका उतारकर केलेका
गाभा खड़ा रहता है अथवा स्वयं आकाशमें ही उसका कोई अवयव निकलता है, उसी
प्रकार वह योगी भी उस समय हो जाता है। जिस समय योगीका शरीर इस प्रकारका
हो जाता है, उस समय उसे खेचर (आकाशमें संचार करनेवाला) कहते हैं। जिस
समय योगीको यह योग्यता प्राप्त हो जाती है, उस समय उसका शरीर संसारमें एक
बहुत बड़ा चमत्कार कर दिखलाता है। हे अर्जुन, इस प्रकार योगकी साधना करने-
वाला मनुष्य जिस समय चलता है, उस समय अणिमा मावि आठो सिद्धियाँ उसके
चरणोंक आगे हाथ जोड़े खड़ी रहती हैं। परन्तु, हे अर्जुन, इन सिद्धियों की बातोंसे हम
लोगोंका क्या मतलब है? मुख्य तात्पर्य यही है कि योगियोंके स्वयं शरीरमें ही पृथ्वी,
अप और तेज इन तीनों महाभूतोंका लोप हुआ रहता है। पृथ्वीका अंश अपमें घुल
जाता है, अपका अंश तेजमें समा जाता है और तेजका अंश हृदयके पवनमें चला
जाता है। फिर अन्तमें एक मात्र पवन ही रह जाता है और वह भी केवल शरीरके
रूपमें ही रहता है। परन्तु कुछ समय बीतने पर वह भी आकाशमं सम-रस होकर लुप्त
हो जाता है। उस समय उस शक्तिका कुंडलिनी नाम भी मिट जाता है और उसे
मारुति (अर्थात वायु) के साथ एक नया नाम प्राप्त हुआ है। लेकिन फिर भी जब तक वह
ब्रह्म-स्वरूपमें मिल नहीं जाती, तब तक उसमें शक्ति बनी हो रहती है। फिर वह
ऊपर बतलाया हुआा "जालन्धर" नामक बन्ध छोड़कर बऔर काकी-मुखी सुषुम्ना नाडीका
मुँह फोड़कर ब्रह्म-रन्धमें प्रवेश करती है। फिर वह ओंकारकी पीठ पर पैर रखकर
चटपट पश्यन्ति-वाचकी की सीढ़ियाँ पार करता है। फिर वह आधी मात्रा तक - अर्थात
ओंकारमें के मकार तक उसी प्रकार ब्रह्म-रन्ध्र में घुसती है, जिस प्रकार समुद्रमें नदी
प्रवेश करती है। फिर वह ब्रह्म-रन्धमें स्थिर होती है और अपनी सोऽहंवाली भावनाकी
भुजा फैलाकर बड़े बावेशसे परब्रह्मके साथ मिलती है। उस समय पंच-महाभूतोंका
परदा दूर हो जाता है और तब वह शक्ति परब्रह्मके गले लगती है और तब आकाशके
सहित उस परब्रह्ममें एक-जीव होकर लीन हो जाती है। जिस प्रकार समुद्रका जल
मेषोंके द्वारा शुद्ध होकर नदी-नालोंमें पहुँचता है, पर अन्तमें फिर उसी समुद्रके पानीमें
मिलकर अपना मूल स्वरूप प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार जीवात्मा भी देहकी
सहायतासे परमात्मामें मिलकर उसके साथ एक हो जाता है। उस समय इस बातका
भी विचार करनेकी कोई जगह बाकी नहीं रह जाती कि जीवात्मा और परमात्मा
दोनों अलग अलग थे और अब मिलकर एक हो गये हैं अथवा दोनों मिलकर एक
ही वस्तु हैं। इस प्रकार गगनमें
समय अनुभव होता है, उसी समय
लिए ऐसे शब्द ही कहीं नहीं मिलते
लीन होनेकी जो स्थिति है,
उसको उसका ठीक ठीक
उसका मनुष्य को जिस
ज्ञान भी होता है। इसी
जिनके द्वारा उसका वर्णन संवाद के प्रान्तमें लाया
करने में सक्षम हो। हे अर्जुन, वैखरी वाणी जो आमतौर पर इस पर गर्व करेगी
है कि मुभमें अभिप्राय प्रकट करने की शक्ति या गुण है, वह भी इस विषय में दुर्बल ही सिद्ध होती और दूर ही रहती है। भौंहों के पिछले भाग में केवल मकार-अर्थात् बोंकार की तीसरी मात्रा की ही केवल आड़ होती है। परन्तु उसे हटाकर गगन की बोर जानेमें प्राण वायुको भी परिश्रम करना पड़ता है। इसके उपरान्त जब वह प्राण- बायु ब्रह्मरन्ध के आकाश में मिलकर एक हो जाती है, तब शब्दों के लिए वर्णन करने योग्य कोई बात ही बाकी नहीं रह जाती और इसी लिए शब्दों की सामर्थ्य का भी अन्त हो जाता है । इसके बादकी सीढ़ी या दरजा तो यही है कि स्वयं उस गगन या आकाशका ही लय हो जाय। जब उस गगन का भी लय हो जाता है, अर्थात् जब महाशून्य के अगाध दहमें उस गगन का भी कहीं पता नहीं रह जाता, तब भला वहाँ शब्द की मात्रा या शक्ति क्योंकर काम आ सकती है ? अतः यह बात त्रिकाल सत्य है कि यह विषय ऐसा स्पष्ट और सहज नहीं है जो वाणीके क्षेत्रमें जा सके अथवा श्रवणेन्द्रिय को जिसका आकलन हो सके। यहाँ तो केवल यहीं कहा जा सकता है कि यदि ऐसा सौभाग्य प्राप्त हो सके तो इसका प्रत्यक्ष अनुभव करना चाहिए और तब बात्म-स्वरूप हो जाना चाहिए । इसके बाद जानने योग्य और कोई बात बाकी नहीं रह जाती। अतः हे वीरश्रेष्ठ अर्जुन, बार बार इसी बात की पुनरुक्ति करनेसे क्या लाभ ? इस प्रकार जहांसे शब्द भी वापस लौट जाते हैं, जिसमें संकल्प-विकल्प सब नष्ट हो जाते हैं और जिसमें विचार की हवा भी प्रवेश नहीं कर सकती, जिस उन्मनी अवस्थाका सौन्दर्य चतुर्ष अवस्था का अर्थात् ब्रह्मात्मक जीवन्मुक्तिका पूर्ण वैभव है, जो मादि-रहित, अपरिमित और सर्वश्रेष्ठ तत्वके रूप में परिगणित होनेके योग्य है, जिसे विश्वका आदि बीज, योग- साधना का अन्तिम साध्य और आानन्द का केवल चैतन्य रूप समझना चाहिए, जिसमें आकार की मर्यादा, मोक्षकी एक-रूप अवस्था और प्रारम्भ तथा अन्तकी सीमाएँ बिलकुल निमूल हो जाती हैं, जो पंच महाभूतोंका मूल कारण, महातेजका भी तेज है और, हे अर्जुन, तात्पर्य यह कि जिसे मेरा बात्म-स्वरूप ही समझना चाहिए और नास्तिकोंके द्वारा भक्त-जन-समूह के छले जाने के कारण जिसे सगुण होकर यह चतुर्भुज आकार धारण करना पड़ा है, वह महामुत्रात्मक परमात्म-तत्व वर्णनकी सीमाएं बाहर का ही हैं। परन्तु जिन पुरुषोंने आत्म-स्वरूप प्राप्त कर लिया है, अन्तिम साध्यको सिद्धि होने तक जिन्होंने दृढ़ निश्चयपूर्वक प्रयत्न किया है और मेरे ऊपर बतलाये हुए प्रकार से जिन्होंने अपना शरीर सार्थक किया है, वे लोग शुद्ध होकर मेरे ही समान हो जाते हैं। उनके शरीर की कांति देखने से ऐसा जान पड़ता है कि वे परब्रह्म रूपी रससे शरीर रूपी साँचेमें हल्ले हुए स्वयं परब्रह्म के ही बने हुए पुतले हैं। यदि मनमें इस प्रकार का पूरा पूरा अनुभव हो जाय तो फिर ऐसा जान पड़ने लगता है कि यह विश्व नहीं है, बल्कि प्रत्यक्ष परब्रह्य हो है।
यह सुनकर अर्जुन ने बीच में ही कहा - "देव , आप जो कुछ कहते हैं, एह बिलकुल ठीक है। क्योंकि हे देव, आपने अभी साधना का जो प्रकार बतलाया है, उससे स्पष्टतः परब्रहा की प्राप्ति होती है। जो लोग दृढ़ निश्चयपूर्वक यह योगाभ्यास करते हैं,
4
वे निस्सन्देह ब्रह्मत्वको प्राप्त होते हैं। आापने अभी जो कुछ बतलाया है, उससे मुझे यह बात अच्छी तरह ज्ञात हो गई है। है देव, आपने अभी जो केवल वर्णन किया है, बह सुनकर ही मेरे मनको बहुत कुछ बोध हो गया है। फिर जिसे इसका प्रत्यक्ष अनुभव हुआ हो, वह यदि तल्लीन हो गया हो तो इसमें आश्चर्य ही क्या है ! इसी लिए अब इस विषयमें और कोई ऐसी बात बाकी नहीं रह गई है कि जिसके सम्बन्धमें मैं आपसे और कुछ पूहूं। परन्तु फिर भी मैं एक बात कहता हूँ। आप क्षण भरके लिए इधर ध्यान दें। हे देव, आपने अभी जो योग बतलाया है, वह अच्छी तरह मेरे मनमें बैठ गया है। परन्तु सामर्थ्य न होने के कारण मैं पंगु के समान हूँ, और इसी लिए मुझसे इस योग की साधना नहीं हो सकती। मेरे शरीर में जितनी शक्ति है, यदि उतनी ही शक्ति से यह योग सिद्ध हो सकता हो तो मैं इस मार्ग का सहज में ही अम्यास करूँगा। लेकिन आप जो कुछ कहते हैं, उसके अनुसार कार्य करनेको मुझमें योग्यता या शक्ति ही न हो तो मुझे ऐसी ही बातें पूछती चाहिए जो मेरी दुर्बलता को शोभा देती हों-जो उसके अनुकूल पड़ती हों। मेरे मनमें इसी प्रकारकी इच्छा उत्पन्न हुई है, इस लिए मैं आपसे एक बात पूछता हूँ।" इसके उपरान्त अर्जुन ने कहा- "हे देव, आप इधर ध्यान दें। आपने जो जो साधन बतलाये हैं, वे सब मैंने सुन लिए हैं। परन्तु अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि क्या वे साधन ऐसे हैं, जिनका साधारणतः जो चाहे, वही अभ्यास कर सकता है अथवा वे ऐसे साधन हैं जो बिना कुछ विशिष्ट योग्यता हुए प्राप्त ही नहीं हो सकते ?" इसपर श्रीकृष्णने पार्थसे जो कुछ कहा, वह सुनिये । वे बोले - "यह तो परमार्थ का बहुत ही विकट कार्य है। परन्तु, हे अजुन यदि कोई सामान्य कार्य भी हो तो वह भी तब तक कभी सिद्ध नहीं हो सकता, जब तक उसके कत्तमेिं उसे करनेकी योग्यता न हो। परन्तु जिसे योग्यता कहते हैं, उसका निश्चय तो कार्यको सिद्धि होने पर ही होता है। क्योंकि अपने आपमें योग्यता होने पर जो कार्य आरम्भ किया जाता है, वही सिद्ध होता है। परन्तु इस प्रकार की योग्यताके कारण इस काममें नामको भी कोई अड़चन नहीं होती। और फिर मैं तुम्हीसे एक बात पूछता हूँ । योग्यताकी क्या कहीं कोई खान होती है जिसके मिलते हो मनुष्य जितनी योग्यता चाहे, उतनी अपने आपमें भर ले ? यदि कोई मनुष्य जस सा विरक्त होकर देहके विहित कर्म नियमपूर्वक करने लग जाय तो क्या बही पुरुष अधिकारी नहीं सिद्ध होता ? इसी प्रकार तुम भी अपने आपमें इतनी योग्यता ला सकते हो कि वासना-रहित होकर सब विहित कर्म कर सको।" इस प्रकार ये बातें कहकर श्रीकृष्णने अर्जुनके मन का दुःख दूर किया। फिर उन्होंने अर्जुन से कहा- "इस विषय में यह एक नियम है कि जो मनुष्य अपने विहित कर्म विरक्त होकर नहीं करता, उसमें यह योग्यता कभी आ ही नहीं सकती ।
न तो बहुत अधिक खाने वाले का कोई योग है, न ही अकेले न खाने वाले का। हे अर्जुन, न तो ऐसा उसके लिए है जो स्वप्न देख रहा है, न ही उसके लिए जो जाग रहा है।
जीभके चोंचलों का दास बन गया हो अथवा जो पूर्ण रूपसे निद्राके अधीन
हो गया हो, वह कभी इस साधनाका अधिकारी नहीं हो सकता। अथवा जो दुराग्रहके बन्दीगृहमें प्यास और भूखको बन्द करके अपना शरीर तोड़ डालता है, खाना-पीना छोड़ देता है अथवा इसी प्रकारके आग्रहके कारण सोनेका नाम भी नहीं लेता और जो इस प्रकार हठपूर्वक सब काम करता है, उसका स्वयं शरीर ही उसके अधीन नहीं होता। फिर भला ऐसे मनुष्यसे योगकी साधना कैसे हो सकती है? इसी लिए जिस प्रकार विषयोंका अतिरिक्त या आवश्यकतासे अधिक सेवन नहीं करना चाहिए, उसी प्रकार उनके साथ ढेप भी नहीं करना चाहिए और उन्हें जबरदस्ती पूरी तरहसे दवाकर भी नहीं रखना चाहिए ।
व्यक्ति को ठीक से खाना चाहिए, मनोरंजन का आनंद लेना चाहिए और अपनी गतिविधियों में ठीक से चलना चाहिए। स्थिर स्वप्न से जाग्रत व्यक्ति के लिए योग दुःख का नाश करने वाला है। "भोजन तो करना चाहिए, परंतु वह उचित एवं समुचित होना चाहिए। सब।"
काम इस प्रकार उचित और ठिकानेके होने चाहिएँ। नपी-तुली बातें कहनी चाहिए", ठीक तरह से चलना चाहिए और उचित समय पर निद्राका भी सेवन करना चाहिए । यदि कभी जागनेकी आवश्यकता हो तो जागरण भी नियमित होना चाहिए। ऐसा करनेसे शरीफके कफ-पित्त आदि धातु (रस) अपने उचित परिमाणमें रहते हैं और सुख होता है। इस प्रकार यदि नियमित रूपसे इन्द्रियोंको उनके विषयोंका अन्न दिया जाय तो मन सन्तुष्ट रहता है।
जब मन नियंत्रित हो जाता है तो वह आत्मा पर स्थिर हो जाता है। जो इच्छा से मुक्त है और जो सभी इच्छाओं का आनंद लेता है, उसे दृढ़ कहा जाता है। 'जैसे शरीर की बाहरी क्रियाओं पर नियम और नियंत्रण की छाप पड़ गई
है,
अत: भीतर प्रसन्नता बढ़ती है और इस प्रकार योगाभ्यास न करने की स्थिति में भी आप योग का साधन बन जाते हैं। जिस प्रकार सभी प्रकार की महिमा उद्योग के कारण, बल्कि भाग्य की शक्ति से आपके पास आती है, उसी प्रकार जो व्यक्ति सभी कार्यों को सीमित और संयमित तरीके से करता है वह आसानी से योग का मार्ग अपनाता है और आत्म-अनुभव प्राप्त करता है। पूर्णता है. इसीलिए हे अर्जुन, जो भाग्यशाली मनुष्य इस संयमित कर्मयोग को प्राप्त कर लेता है, वह मोक्ष के सिंहासन पर सुशोभित होता है।
की
यह एक दीपक की तरह है जो हवा में रहने पर हिलता नहीं है। उस योगी के लिए जिसने अपने मन को नियंत्रित कर लिया है और अपने भीतर योग का अभ्यास करता है।
“जिस
समय क्रियाओंक संयमका योगके साथ मेल होता है, उस समय यह शरीर पवित्र प्रयाग-क्षेत्र ही हो जाता है। ऐसे शरीरमें जिसका मन ऐसी दृढ़तापूर्वक स्थिर होता है कि जब तक शरीर-पात न हो, तब तक विचलित नहीं होता, हे अर्जुन, उसीबो तुम योग-युक्त समझो । प्रसंग-वश मैं तुम्हें यह भी बतला देता हूँ कि ऐसे योग-युक्त की
उपमा निर्वात स्थानमें रखे हुए दीपककी ज्योतिके साथ दी जाती है। अब मैं तुम्हारे मनका भाव समझकर तुम्हें कुछ और बातें बतलाता हूँ। तुम उन्हें अच्छी तरह ध्यान देकर सुनो। तुम अपने मनमें कार्य सिद्धिकी लालसा तो रखते हो, परन्तु अभ्यासका कष्ट उठानेके लिए क्यों नहीं तैयार होते ? इसमें ऐसी कौन सी कठिनता है जिससे तुम डरते हो ? हे अर्जुन, तुम व्यर्थ अपने मनमें इस बातका डर न करो। ये दुष्ट इन्द्रियां छोटी छोटी बातोंको व्यर्थ ही पहाड़ बनाकर दिखलाती हैं। देखो, यदि कोई इतनी गुणकारी दिव्य औषध हो जो आयुको स्थिर कर सके और शरीरसे निकलते हुए प्राणों- को भी लौटा लावे, तो भी जीभ उस औषधको शत्रु हो मानती है या नहीं ? इसी प्रकार जो कर्म हमारे उच्च कल्याणके लिए अनुकूल होते हैं, वे सब इन इन्द्रियोंको सदा कष्टदायक ही जान पड़ते हैं। और नहीं तो योग साधनाके समान सहज काम वास्तवमें और कोई है ही नहीं।
जब मन को योगाभ्यास द्वारा नियंत्रित कर लिया जाता है, तो उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है। और जहां भी वह स्वयं को स्वयं में देखता है वह स्वयं में संतुष्ट होता है।
जो आसान और चरम है वह बुद्धि से बोधगम्य है और इंद्रियों से परे है। वह जानता है कि वह कहाँ है और वास्तव में जब वह स्थित होता है तो वह हिलता नहीं है।
"इसी लिए मैंने दृढ़ आसन लगाकर करनेके लिए, जो योगाभ्यास बतलाया है, उससे इन इन्द्रियोंका अच्छा नियन्त्रण होगा। क्योंकि यदि वास्तविक दृष्टिसे देखा जाय तो जब योग-साधनासे इन्द्रियोंका निग्रह होता है, उसी समय चित्त आत्म-स्वरूपमें प्रवेश करने लगता है। फिर जब चित्त वहाँसे लौटता है और बात्म-स्वरूपकी ओर उसकी पीठ होती है और वह अपने केवलात्म स्वरूपकी ओर देखता है, तब उसे देखते ही वह पहचान जाता हैं और कहता है-"मैं स्वयं यही तत्व हूँ।" ज्योंही वह उसे पहचान लेता है, त्योंही वह सुखके साम्राज्यका भोग करने लगता है और फिर आपसे उस परमात्म तत्व- के साथ मिलकर एक रूप हो जाता है। जिसके आगे या उस पार और कुछ भी नहीं है और जिसका वास्तविक ज्ञान इन्द्रियोंको कभी होता ही नहीं, उसीके साथ वह तन्मय होकर अपनी जगह पर भात्म-सुखमें रहता है।
जब उसने इसे प्राप्त कर लिया है तो वह इसे एक और लाभ मानता है और इससे अधिक कुछ नहीं जो कोई इसमें बना रहता है, वह भारी से भारी पीड़ा से भी विचलित नहीं होता।
"उस समय चाहे मेरु पर्वतके समान भारी दुःखका पर्वत भी उसके शरीर पर क्यों न आ पड़े, परन्तु फिर भी उसका चित्त कभी विचलित नहीं होता। अथवा चाहे उसका शरीर शस्त्रोंसे छेद डाला जाय और चाहे वह अग्निमें जा पड़े, परन्तु फिर भी आत्म-तत्वके महासुखमें सोया हुमा चित्त जागने का नाम भी नहीं लेता। जब चित्त इस प्रकार आत्म-तत्वमें विलीन हो जाता है, तब वह इस शरीरको ओर कभी भूलकर भी नहीं देखता । उसे अलौकिक बात्म-सुख प्राप्त हो जाता है और इसीलिए वह इस शरीरके सुख-दुःखोंकी सब बातें ही भूल जाता है।
जिसे दुःख का संयोग और वियोग कहा जाता है उसे योग कहते हैं। उस योग का अभ्यास दृढ़ निश्चय और शांत मन से करना चाहिए।
"जिस सुखका माधुर्य चख लेने पर संसारके बन्धनोंमें फंसा हुआ मन वासनाओंका कभी स्मरण या ध्यान भी नहीं करता, जो सुन योगकी शोभा और सन्तोषकी राज- सम्पत्ति है और जिस सुखके लिए हो ज्ञानका शातृत्व काम आता है, वह सुख योगाभ्यासके द्वारा मूत्तिमान होकर सामने दिखाई पड़ने लगता है। अब इस प्रकार उसके दर्शन हो जायें, तभी हम भी उसके साथ मिलकर तद्रूप हो सकेंगे ।
संकल्प से उत्पन्न होने वाली सभी इच्छाओं का पूर्णतः त्याग कर दें। मन के द्वारा ही उन्होंने इन्द्रियों के समूह को सभी ओर से नियंत्रित किया।
"हे अर्जुन, जो यह योग तुम्हें बहुत ही कठिन जान, पड़ता है, वह एक तरहसे बहुत ही सुगम है। इसके लिए आवश्यकता केवल इसी बातकी है कि संकल्पकी सन्तान कॉम- क्रोध आदिको मार डालना चाहिए जिसमें उस संकल्पको पुत्र शोक प्राप्त हो। जब संकल्पको यह मालूम होगा कि सब विषय मर गये हैं और उसे इस बातका भी पता चल जायेगा कि इन्द्रियोंका पूर्ण रूपसे निग्रह हो गया है, तब वह अपनी छाती पीटकर आप ही अपने प्राण त्याग देगा। यदि मनको इस प्रकारका बैराग्य प्राप्त हो जाय तो फिर इस संकल्पकी यात्रा भी समाप्त हो जायगी:- इस संकल्पका भी अन्त हो जायगा और बुद्धि बहुत हो सुखपूर्वक बैर्थके मन्दिरमें निवास करने लगेगी ।
धीरे-धीरे उसने मोटी न होने की सूझबूझ से तेल का दामन थाम लिया। आत्मा में स्थित मन के साथ किसी भी चीज़ के बारे में नहीं सोचना चाहिए। मन जहां भी सांस ले रहा है, वह बेचैन और अस्थिर है। समय-समय पर इस पर नियंत्रण रखना चाहिए और इसे केवल स्वयं के नियंत्रण में लाना चाहिए।
"यदि बुद्धिको धैर्य प्राप्त हो जाय तो वह मनको धीरे-धीरे अनुभवके मार्गमें चलाने लगेगी और अन्तमें उसे ले जाकर परमात्म-मन्दिरमें बैठा देगी। इसलिए तुम यह बात ध्यानमें रखो कि इस प्रकारसे भी आत्म-प्राप्ति होती है। परन्तु यदि यह प्रकार भी तुमसे न सघ सके तो इससे भी एक और सहज मार्ग है। वह भी सुन लो। हम अपने मनसे यह एक नियम कर लें कि हम जो निश्चय कर लेंगे, उससे एक पग भी इधर-उधर न होंगे । यदि यही नियम करनेसे मन स्थिर हो जाय तो फिर समझ लेना चाहिए कि वह अपने काममें लग गया। पर यदि यह पता चले कि इस प्रकार मन स्थिर नहीं रहता, तो फिर उसे बिलकुल खुला छोड़ देना चाहिए। फिर इस प्रकारसे अनियन्त्रित छोड़ा हुआ मन जहां जाय, बहाँसे उसे नियन्त्रित करके लौटा लाना चाहिए। बस इसीसे
उसे धीरे-धीरे स्थिर रहनेकी आदत पड़ जायगी।
यह उस योगी के लिए सर्वोत्तम सुख है जिसका मन शांत है। उपैति शान्तराजसम्
ब्रह्मभूतमकलमशम्
GYANESHWARI - SANT GYANESHWAR.png)