साधना के सोपान
जीवन में दो ही प्रकार के व्यक्ति सहज सरल और हरदम खुश रह सकते हैं।
पहले वह जो बालक है और दूसरे वह जो पागल हैं।
सहज और सरल बालक बनकर हम कुंडलिनी माता की गोद में बैठ सकते हैं, गुरुदेव के चरणों में बैठ सकते हैं। अब गुरुदेव का काम है, हमें कैसे रखना है।
दूसरा प्रकार पागल का है हम गुरुदेव के प्रेम में इतने पागल हो जाए, इतने पागल हो जाएं कि दुनिया हमें पागल कहे, पागलों से पंगा कौन ले तो हर व्यक्ति पागलों से दूर ही रहना चाहता है यह भी एक तरीका है अपने आप में मस्त रहने का।
अब बालक बनने के लिए हमें गुरु भक्ति करनी पड़ेगी, गुरु भक्ति कैसे होगी, जब हम गुरुदेव का मंत्र जपेंगे, जब हम मंत्र जपते हैं, मानसिक जप करते, करते मंत्र हमारी सांसो में बस जायेगा। तब हम गायेंगे-
सांसों की माला में सिमरु मैं, तेरा नाम
बन जाऊं बंदा मैं तेरा हे कृपा निधान।
अब जाप करते-करते मंत्र, गले में जाएगा, गले से छाती में जाएगा, छाती से नाभि में जाएगा तब हम गुरू से जुड़ जाएंगे,
पागल बनने के लिए हमें संकल्प साधना करनी होगी, हमें अध्यात्म विज्ञान को जानना होगा, आत्म सत्ता में प्रवेश पाना होगा।
साधना तो भौतिक शरीर से ही शुरू होगी भौतिक जगत से ही शुरू होगी और पारलौकिक जगत का अतिक्रमण करती हुई अध्यात्म जगत में प्रवेश करना ही पड़ेगा इन्हीं तीनो में सारा ब्रह्मांड समाया हुआ है।
पहले चरण में हम अपने शरीर को सिद्ध करेंगे फिर हम अपने मन को शुद्ध करेंगे,
हमें अपनी पांचों इंद्रियों, पांचों ज्ञानेंद्रियों को समझना होगा, मन इनके सहारे ही काम करता है
जब गुरुदेव हमें दिव्य अनुभूतियां कराते हैं तो हमें पांचों तत्वों की तन्मात्राओं का रसास्वाद मिलने लगता धीरे-धीरे हमारा मन इंद्रियों से अलग होने लगता है।
पृथ्वी तत्व की तन्मात्रा सुगंध है, हमें दिव्य सुगंधे आती है, जल तत्व की तन्मात्रा रस है, हमें जिव्हा पर अनेक स्वाद मिलते हैं, अग्नि तत्व की तन्मात्रा रूप है, हमें दिव्य दर्शन होते हैं, वायु तत्व की मात्रा स्पर्श है, हमें आत्मा का, परमात्मा का, कुंडलिनी का दिव्य स्पर्श रोम रोम में एहसास होता है, आकाश तत्व की मात्रा शब्द है, फिर हमें दिव्य नाद सुनाई देते हैं तब हमारा मन धीरे धीरे भौतिक शरीर से,भौतिक इंद्रियों अलग होने लगता है,
अब मन को पारलौकिक जगत में रस आने लगता है।
मन चमत्कार करने वाली घटनाएं देखता है, सुनता है, और चकित हो जाता है विस्मय से उसकी बुद्धि, उसकी चेतना उससे अलग हो जाती है, चेतना लुप्त होते ही प्रज्ञा प्रकट हो जाती है साधक आध्यात्मिक जगत में प्रवेश पा जाता है।
पारलौकिक जगत में हमें मन का बुद्धि से संबंध विच्छेद करना पड़ता है, यहां मन की एक प्रकार की मृत्यु ही है और मन अमन हो जाता है। एक सूर्य भौतिक है, एक सूर्य और है वह है आत्म सूर्य जिसके दर्शन योगियों को कूटस्थ में होते हैं|
उस कूटस्थ सूर्य में योगी अपने समस्त अस्तित्व को विलीन कर देता है| उस सूर्य को ज्योतिर्मय ब्रह्म भी कह सकते हैं|
पहले एक स्वर्णिम आभा के दर्शन होते हैं फिर उसके मध्य में एक नीला प्रकाश फिर उस नीले प्रकाश में एक श्वेत पंचकोणीय नक्षत्र जिसमे ही प्रवेश करते हैं| उस पंचकोणीय नक्षत्र का भेदन करने पर योगी की चेतना परमात्मा के साथ एक हो जाती है| उसका कोई पृथक अस्तित्व नहीं रहता|
पंचमुखी महादेव उसी पंचकोणीय नक्षत्र के प्रतीक हैं| यह योग मार्ग की सबसे बड़ी साधना है| यह श्वेत ज्योति ही कूटस्थ ब्रह्म है|
आरम्भ में योगी अजपा जाप द्वारा कूटस्थ पर ध्यान करते हैं फिर वहीं अनहद प्रणव सुनता है जिसका ध्यान करते करते सुक्ष्म देहस्थ मेरुदंड के चक्र जागृत होने लगते हैं|
सुषुम्ना में प्राण तत्व की अनुभूति होती है और शीतल (सोम) व उष्ण (अग्नि) धाराओं के रूप में ऊर्जा मूलाधार से मेरुशीर्ष व आज्ञा चक्र के मध्य प्रवाहित होने लगती है|
सुषुम्ना में भी तीन उप नाड़ियाँ -- चित्रा, वज्रा और ब्राह्मी हैं जो अलग अलग अनुभूतियाँ देती हैं|
गुरुकृपा से आज्ञा चक्र का भेदन होकर सहस्त्रार में प्रवेश होता है| गुरू प्रदत्त कुछ मंत्र( https://youtu.be/yIr-NqzxgTo ) के साथ इस ऊर्जा का सुषुम्ना में सचेतन प्रवाह होने लगता है जिसका उद्देश्य समस्त चक्रों की चेतना का कूटस्थ में विलय है|
अब साधक आध्यात्मिक जगत में प्रवेश हो जाता है जंहा काल और समय पीछे छूट जाते हैं। साधक आनंद में डूब जाता है यह आत्मा का आनंद है सिद्ध योग से इस शाश्वत आनंद की प्राप्ति होती है।
गुरुदेव ही उसे आनंद के विभिन्न आयामों से परिचय करवाते हैं अगर गुरुदेव ना उठाएं तो साधक ना जाने कितने समय उन्हीं में विचरण करता रहे। निजानंद में साधक सच्चिदानंद स्वरूप हो जाता है।
अधिकांश साधक भक्तियोग में ही रह जाते है ज्ञानयोग की साधना वही कर पाता है,जो साधक, आदर्शवादी, सत्याचरण, कर्मठ, चरित्रवान, ऊर्जावान,वीर्यवान दृढनिश्चयी एवं संकल्प वाला होगा।
यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहीं,
शीश उतारी भुई दरें, तब बैठो घर माही ।
जो घर जारे आपनो चले हमारे संग.......
सबसे बड़ी शक्ति जो आपको ईश्वर की और ले जा सकती है वह है -- अहैतु का परम प्रेम|
उस प्रेम के जागृत होने पर साधक को स्वयं परमात्मा से ही मार्गदर्शन मिलने लगता है| वह अहैतुका परम प्रेम आप सब में जागृत हो|
सभी प्रबुद्ध ,सूझवान और समझदार लोगौ को आमंत्रण..सिद्धयोगा एक कल्पतरु का पेड़ है भावना के अनुसार क्रियाशील होता है आओ इसका अभ्यास करें.....
....सिद्धयोग का अभ्यास किया ही जा सकता यह अपने आप स्वचालित स्वघटित होता है। सिद्ध योग के अभ्यास का मतलब है- हमेशा, धैर्य,समभाव, कृतज्ञता, और आनंद के राज्य में रहना....जय गुरुदेव जी (साभार श्री महेश कुमार दत्ता जी UK)

