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मानव से महामानव की ओर ...............



हमारी ही चेतना का विस्तार, यह अखिल ब्रह्मांड है, जिसे हम नहीं जानते.


जो जानते है वही, हमें जना सकते हैं.....


चेतना के विस्तार को सुषुप्त अवस्था में पड़े मुख्यतः छह चक्रों और तीन ग्रंथियों ने बाधित किया हुआ है....


इनमें सबसे बडी़ बाधाएं तीन ग्रंथियों की हैं यह जड्तत्व और आत्म तत्व का संयोग नहीं होने देती यह है, 


ब्रह्म ग्रंथि------विष्णु ग्रंथि-----और रूद्रग्रंथी।।


मूलाधारैकनिलया ब्रह्मग्रन्थि विभेदिनी |

मणिपूरान्तरुदिता विष्णुग्रन्थि विभेदिनी ||८९||

आज्ञाचक्रान्तरालस्था रुद्रग्रन्थि विभेदिनी |

सहस्राराम्बुजारूढा सुधासाराभिवर्षिणी


इन तीन ग्रन्थियों (ब्रह्म ग्रन्थि, विष्णु ग्रन्थि और रुद्र ग्रंथि) को तुम किसी प्रकार खोल नहीं सकते, चाहे करोड़ों उपाय कर लो, इनको तो गुरु ही कृपा करके खोलेंगे। इसमे प्रथम ग्रंथि जल्दी ही खुल जाती है यह ब्रह्म ग्रंथि है--गुरु किसी एक कर्म में साधक को लगाकर जीवन को नई दिशा दे देते हैं।


आओ सिध्दयोग द्वारा इनका भेदन कर जागरण करे।


आसन से रोग, प्राणायाम से पातक, प्रत्याहार से मनोविकार दूर होते हैं और धारणा से धैर्य, ध्यान से ऐश्वर्य और समाधि से मोक्ष प्राप्त होता है। कर्म बंधन कटते हैं।


ब्रह्म ग्रंथि ( रजोगुण ).......


भौतिक संसार की और जीव को उलझाय रखना इस ग्रंथि का मुख्य धर्म है। यह एक बड़ी बाधा है,एक साधक के मार्ग में


महामोहिनी माया,साधक को,धन -पद -वैभव -ऐशवर्य,भोगो की तृष्णा और मृगमारीचिका में उलझाकर,अज्ञानता,कामुक विचारो और कर्मो मे ,अतृप्त भूख में जकड़े रखती है...


इसके खुलते ही शरीर झनझनाहट के साथ कम्पायमान हो उठता है,बुखार चढ़ जाता है, रीढ़ के निचले भाग मे दर्द की अनुभूति होती हे ..


अब साधक ऊर्ध्वरेता और संयमित जीवन की ओर अग्रसर हो जाता है ..


उसका खाना-पीना,उठना-बैठना,बोलना-चालना,घूमना-फिरना,देखना-सुनना सब अपने आप बदल जाता है,शरीर सुद्र्ड,आकर्षक और आँखों में ,वाणी मे आकर्षण प्रकट हो जाता है,दया,नम्रता,अहिंसा,क्षमा आदि की,देवीय संपदा साधक को प्राप्त होती है l यह ग्रंथि मूलाधार, स्वाधिष्ठान और मणिपूरक चक्र को नियंत्रित करती है l


विष्णु ग्रंथि ( सतोगुण)......


दूसरी विष्णु ग्रंथि गुरु की निकटता अर्थात् उनकी उपासना से खुलती है जो साधक गुरू निहारने की कला में पारंगत हो जाएगा, वही खोल पाएगा! 


एक साधक के मार्ग में दूसरी बड़ी बाधा,विष्णु ग्रंथि के रूप में है, यह अनाहत और विशुद्ध चक्र को जाग्रत नही होने देती और यह नीचे के तीनो चक्रों को भी नियंत्रित करती है


यह ग्रंथी व्यक्ति को गहन अहंकार से युक्तकर उसे स्वार्थी बना देती है,मोह के वशीभूत कर रिश्तों से, मान-मर्यादा से,पद से ,समाज से, देश-धर्म से तीव्र लगाव में जकड़ती है, दूसरे को कमतर और नीचा दिखाने की वृति में डाले रखती है, उसकी मानसिक अज्ञानता को दूर नही होने देती।


इसके भेदन से ह्रदय स्थल मैं बहुत दर्द होता है, सांस के रूकने जैसी अनुभूति होती है। साधक में एक जुनून सा व्याप्त हो जाता है, ईच्छाशक्ती बढ़ जाती है,रिध्दी-सिध्दी की इच्छा बलवती हो जाती है, विश्वविजयी की उत्कंठा को जन्म देती है, यहां भी साधक के भटकने की संभावना बन जाती है।


गुरू कृपा से, गुरु प्रेम से युक्त होकर साधक जब इसका जागरण करता है, तब उसकी मानसिक मृत्यु हो जाती है, हृदय में प्रेम का सागर उमड़ने लगता है, और उमड़ कर दूसरों को भी आनंदित करता है,उसे कोई अपना-पराया नज़र नही आाता, वृति सात्विक हो जाती है, सारी सृष्ठी के प्रति करूणा उपजती है,दैवियगुण ( शांति, नियमितता, घमंड रहित , ईमानदारी, सादगी, सच्चाई, धैर्य, स्थिरता, गैर चिड़चिड़ापन, अनुकूलनशीलता, विनम्रता, तप, अखंडता, बड़प्पन, उदारता, दान, उदारता-करुणा और पवित्रता )साधक में प्रकट हो जाते है,साधक देवतुल्य हो जाता है।


रूद्र ग्रंथि (तमोगुण) .....


तीसरी ग्रंथि महान कठिन है।उसको जीव किसी प्रकार भी खोलने में असमर्थ होता है।कुछ प्रतीत सी तो होती है परंतु उपाय दृष्टि में नहीं आता।तब साधक जीव अंतर में अत्यन्त आर्त और दुःखी होता है।तब प्रभु का ध्यान साधक की ओर जाता है और वे शिव के रूप में गुरु बन कर साधक के सामने आते हैं और उनके प्रकाश(तेज) से ग्रंथि स्वयं खुल जाती है। सभी चक्रों की नकारात्मक बुराइयां जहां एक बार फिर जो़र मारती है, गुरुदेव ही रक्षा करते हैं, यहां साधक को गुरु को धारण करने की कला में पारंगत होना होगा, साथ ही उसे अश्विनी मुद्रा, वज्रोली मुद्रा, और शक्ति चालिनी मुद्रा में पारंगत होना होगा तभी नैया पार लगेगी!


यह अंतिम सबसे बड़ी बाधा है, जो आज्ञा चक्र को पूर्णरूपेण क्रियाशील नही होने देती। यही स्थान असली प्रयागराज है। त्रिवैणी संगम है, यहां इड़ा-पिंगला-सुषुम्णा का संगम होता है। यह माया का अंतिम स्थान है। यहां अष्ट सिद्धियां और नव निधियां आपका वरण कर....आपकी साधना का अपहरण करने में चेष्टारत रहती है,समस्त मानसिक शक्तियाँ यहां विराजमान है,जो साधक को भूल भुलैया में चमत्कार दिखाती है, अहंकार का यह आखिरी खेल है बिना गुरू की करुण कृपा के इस ग्रंथि का भेदन और जागरण असम्भव है। 


सभी प्रबुद्ध, सूझवान और समझदार लोगों को आमंत्रण..सिद्धयोगा एक कल्पतरु का पेड़ है,भावना के अनुसार क्रियाशील होता है, आओ इसका अभ्यास करे.....


....सिद्ध योग का अभ्यास किया नही जा सकता , यह अपने आप होता है, सिद्ध योग के अभ्यास का मतलब है,हमेशा, धैर्य समभाव, कृतज्ञता, और आनंद के राज्य में रहना....जय गुरुदेव जी साभार महेश कुमार दत्ता जी