* आप दुनिया को अपनी इंद्रियों और मन के चश्मे से देखते हैं। ये इंद्रियां और मन ही आपको यह एहसास दिलाते हैं कि आप कौन हैं।
* आप जो कुछ भी सोचते हैं, अनुभव करते हैं, उसी के आधार पर अपनी पहचान बना लेते हैं। ये विचार और अनुभव दूसरों से सुने या सीखे गए हो सकते हैं, जरूरी नहीं कि ये पूरी तरह सच हों।
* भूख, प्यास, बीमारी, ये सब चीजें आपको भी महसूस होती हैं। आप इनके प्रभाव में आ जाते हैं और इन्हें ही अपना सच मान लेते हैं।
* आप फिल्म के पात्र की तरह हैं। फिल्म के पात्र को कैसा होना है, क्या करना है, ये सब पहले से तयशुदा होता है। आप भी उसी तरह जीवन की धारा में बहते रहते हैं, इसे बदलने की कोशिश नहीं करते।
**माया से मुक्त (आत्मा):**
* आप भी दुनिया को उसी तरह देखते, सुनते, महसूस करते हैं, लेकिन इन सब से अलग रहते हैं। आप एक साक्षी की तरह इन अनुभवों को देखते हैं।
* आप फिल्म के पर्दे की तरह हैं। फिल्म के पर्दे पर तस्वीरें आती हैं, जाती हैं, पर पर्दा खुद वही रहता है। आप भी जीवन के सुख-दुख से प्रभावित नहीं होते।
* आप जानते हैं कि भूख, प्यास, बीमारी ये सब माया का ही खेल है। आप इनसे ऊपर उठकर अपने असली स्वरूप को पहचानने का प्रयास करते हैं।
* आप सिर्फ सवालों के जवाब स्क्रीन पर नहीं देखते, बल्कि ये सवाल और जवाब खुद भी पैदा करते हैं। आप अपने जीवन को खुद गढ़ते हैं, उसे नियंत्रित करते हैं।
माया का जाल संसार को भ्रम में रखता है। आप जो महसूस करते हैं, वही आपका सच मान लेते हैं। दूसरी ओर, आत्मा माया से परे है। वह सिर्फ एक साक्षी की तरह दुनिया का अनुभव करता है और अपने असली स्वरूप को जानने का प्रयास करता है।

