जब जगत मिथ्या है तो हम कर्म क्यों करें? घर क्यों न छोड़ दें?
“ब्रम्ह सत्यम जगत मिथ्या” ये सही है तो फिर कर्तव्य और कर्म का क्या महत्व है, मिथ्या जगत के लिए इतना सब क्यूँ
किया जाए?
धर्म की बातें कभी कभी समझ नहीं आती| एक तरफ कर्म का महत्व तो दूसरी तरफ शरीर और जगत की क्षण भंगुरता|
हम दिन-रात इतनी मेहनत करते हैं, किसके लिए? उस शरीर के लिए जो एक दिन नष्ट ही हो जाना है? उन रिश्ते-नाते-दारों के लिए जो अपने हैं ही नहीं, और एक दिन छूट ही जाने है|
कितनी झंझट लगती है| दिन रात मेहनत करें फिर भी कोई संतुष्ट नहीं होता| लोगों का ख़याल रखो, उनकी देखरेख करो, उनके लिए पैसा कमाओ फिर भी शांति नहीं|
धर्म शास्त्र कहते हैं मोह मत पालो, उपर वाले से मन के तार जोड़ो| वही तो एकमात्र अपना है बाकी सब सपना है| यदि ऐसा ही है तो इस क्षण-भंगुर जीवन के लिए इतना झंझट क्यूँ करें? क्यों न सब कुछ छोड़ छाड़ कर बैरागी हो जाएँ?
बात विपरीत है|
वस्तु स्थिति ये है कि सबकुछ क्षण-भंगुर होने का अहसास होने के बाद भी हम एक दम से मुक्त नहीं हो सकते| मुक्ति के लिए कर्म के ज़रिये पहले कर्म बन्धनों को काटना होगा| कर्म को कर्म से ही काटा जा सकता है|
सुख के समय हमे ये जगत मिथ्या नहीं लगता| ९९ फीसदी लोगों में वैराग्य, असफलता और चुनौतियों के कारण होता है| ये वास्तविक वैराग्य नहीं बल्कि काल्पनिक परिस्थितिजन्य पलायनवाद है|
जब तक शरीर फिट है, रिश्ते ठीक हैं, कमाई ठीक ठाक है कौन घर से भाग जाना चाहता है| यदि आपके मन में संसार से ऊब आ रही है और आप मानते है कि ये अध्यात्म के कारण है तो आप भूल में हैं| अध्यात्म संसार को परिवर्तनशील बताता लेकिन उसे छोड़कर भाग जाने की सलाह नहीं देता| छोड़ने के भाव के पीछे कर्म के कारण मिले कोई कष्ट हैं| कष्ट को भोगना ही पड़ता है इसके बिना छुटकारा नहीं| हिसाब किताब निपटाए बिना तो सेठ भी नही छोड़ता प्रकृति कैसे?
माना की संसार अस्थाई है, सबकुछ बदलने के साथ छूटना ही है, लेकिन भी आप इसे नहीं छोड़ सकते ये आपको छोड़ेगा जब आप उस अवस्था तक पहुचेंगे| आप भागेंगे तो ये फिर पकड़ लेगा| आप मर भी जायेंगे तो नये जीवन के साथ उससे ज्यादा कष्टदायक माहौल मिलेगा|
इसमें रहकर कर्म करते हुए ही ईश्वर तक बढ़ा जा सकता है| पहले वैराग्य अंदर घटित होता है| असली वैराग्य तभी घटित होता है जब बाहर की परिस्थितियाँ एकदम बेहतरीन हों| कुछ भी कष्टदायक न हो, न शरीर, न घर, न संसार, फिर भी आप सब कुछ छोड़ देते हैं तन से नहीं, अपने मन से, तभी आप मुक्त हो पाते हैं|
गीता ऐसे ही कर्म की शिक्षा देती है| अर्जुन को श्री कृष्ण युद्ध को बाध्य कर देते हैं| हम सब भी ऐसे ही हैं कितने ही संसार की डोर काटना चाहें, नहीं कटती, हमे अपना कर्म और कर्तव्य निभाना ही होता है|
हमे जिंदगी का सच जानते हुए भी इसे जीना होता है| बीच में चलना ही समझदारी है|
ना तो भागो, न ही इतना जोर से पकड़ो कि फिर छूटे नहीं|
मानव धर्म सबलता का समर्थक है| ताकत हासिल करो| अधर्म के लिए लड़ो| निठल्ला बनने से आत्मज्ञान नहीं होता| कुछ नहीं करोगे तो न झूठ बोलना होगा, न हिंसा होगी, न ही किसी का अहित होगा| तो क्या हम मोक्ष के अधिकारी बन गए? अकर्मण्यता से हासिल सत्य, अहिंसा का कोई मतलब नही|
आलसी होकर एक जगह बैठने से कोई ध्यानी नहीं बन जाता| सक्रियता से ही परम निष्क्रियता आती है|
क्रिया से ही अक्रियता आती है| ध्यान और समाधी की अवस्था तब आती है जब व्यक्ति आसन, बंध, मुद्रा, प्राणायाम और धारणा के चरम को पार कर चुका होता है| मंथन से ही अमृत निकलता है|
हम पैसा चाहते हैं लेकिन एक अध्यात्मिक व्यक्ति के पैसे के पीछे भागने को समाज गलत कहता है| आप समाज के डर से अभाव में जीते हो| विवेकानंद कहते है ये मिथ्या आचरण है, पहले खूब पैसा कमाओ| स्वामी जी कहते हैं पहले अपनी वासनाओं को पूरा कर लो तृप्त हो जाओ| तृप्ति के बिना प्यास बची रहेगी| फिर तुम भागोगे| दिखोगे नहीं, लेकिन अंदर मन की भागदौड़ चलती रहेगी|
हमारे धर्म में अनेक ग्रन्थ, किताब और पद्धतियों का अर्थ मानव को प्रैक्टिकल बनाना है| जगह बदलते ही मान्यता बदल जाती है| इसलिए जीने का मार्ग भी अलग हो जाता है| अपनी जीवन शैली और परंपरा के मुताबिक़ जीते हुए, मूल में एक ही सत्य को रखें|
आपके गृहस्थ होने का अर्थ सन्यासी का मजाक उडाना नहीं न ही सन्यासी होने का अर्थ गृहस्थ को कोसना है| सब अपने अपने रस्ते पर अपने कर्म को केंद्र में रखें, शरीर और उससे जुडी पहचान की उपेक्षा न करें|
हम अपना कर्तव्य निभाएं.. ज़रूरी है कि अपने परिवार की देखरेख करें लेकिन उसमे कठिनाई आ रही है तो झूठ, बेईमानी से उसकी पूर्ती को अपना कर्तव्य कहें ये गलत होगा| पूरी मेहनत के बाद घर परिवार का अभाव झेलना कर्म फल के कारण है|
तारीफ़ न मिले तब भी कर्म करते रहना, कठिनाई के बाद भी सच्चाई की राह पर चलते रहना, माता पिता पर गुस्सा न करना उनकी देखरेख करना, पत्नी बच्चों को बेहतर माहौल व् सुविधाएं देना, अतिथि का सत्कार करना, अपनी पत्नी को खुश रखना, भाई बंधुओं की मदद करना| गाँव, नगर की व्यवस्था में सहयोग धर्म में व्यक्ति के कर्तव्य मने गये हैं| गृहस्थ को अपनी घर गृहस्थी की रक्षा के लिए शौर्य दिखना चाहिए| गलत का सम्मान नहीं करने की हिदायत दी गयी है|
कर्म से विद्या, धन, यश और धर्म का उपार्जन गृहस्थ का कर्तव्य है|
आज इतनी व्यवस्थाएं, शिष्टाचार, नियम, कानून, सुविधाएं, तकनीक और मशीने, मानव की इच्छाओं के कारण ही सामने है|
यदि मानव इच्छाएं नहीं रखता तो मानव जाति पिछड़ी ही रहती|
