इतिहास क्या कहता है?
इतिहास की किताबें.. तो पिछले दौर का आतंक, असमानता, उत्पीडन और अत्याचार का युग बताती हैं| पूरी दुनिया का इतिहास लगभग समान है.. जहां असमानता की खाई बहुत गहरी थी… मानवीयता बहुत कम थी …
स्वार्थ्य में डूबा इंसान अपने फायेदे के लिए कुछ भी कर सकता था … जहां बात बात पर युद्ध होते थे … राजा महाराजाओं के अहंकार के चलते लाशें बिछना आम बात थी … जहां राजा ज़मीदार और रसूखदार को सब कुछ करने की आज़ादी थी और आम इंसान सिर्फ इनकी शानो शौकत पूरी करने वाला एक गुलाम…
मानववाद, मानव अधिकार, समभाव आज जैसा कभी रहा ही नहीं| इसी वजह से आज का युग हमे सबसे बेहतर नज़र आता है|
कम से कम उत्पीडन… शोषण .. महिलाओं को आज जितनी आज़ादी है शायद पहले कभी नहीं रही .. आज महिलाओं को जितने अधिकार हैं शायद पहले के मौखिक कानूनों में भी उनका ज़िक्र नहीं|
यत्र नारी पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता कहने वाले भारत के पौराणिक इतिहास के उलट पिछले २,3 हज़ार साल के इतिहास में नारी की जो दुर्दशा हुयी वो आज नहीं है|
हम आज वैश्विक युग में जी रहे हैं एक देश की खोज और आविष्कार का फायेदा देर स्वर पूरी मानव जाति को मिलता है| आजकल बातें होती हैं दुनिया के सबसे खराब दौर की .. लोग चिंतिंत है क्यूंकि उन्हें लगता है इंसानियत मर चुकी है … हम हिंसक होते जा रहे हैं … दुनिया गर्त में जा रही है|
रेप हत्या और हिंसा के मामले से चिंतित लोग तो इसे सबसे खराब दौर करार देते हैं| लेकिन ये निराशावाद है| तस्वीर का दूसरा पहलू भी होता है| थोड़ा पहले जाईये.. बच्चों को कैसे तन्त्र मन्त्र के नाम पर बली चढाई जाती थी? कैसे औरतों पर भूत प्रेत और चुडेल बाधा के नाम पर अत्याचार होते थे? कैसे बेटी को गर्भ में ही मार दिया जाता था? कैसे जात-पात और ऊँच-नीच, काले गोरे के नाम उत्पीडन होते थे|
आज बॉलीवुड में ड्रग का एक चाट आते ही बवाल मच जाता था लेकिन ये दुनिया पहले नशे में किस तरह डूबी होती थी कैसे गांजा चरस खुलेआम बिकता था मालुम है पुराने लोगों को| युवाओं को सिर्फ नकारात्मक ही दिखाते जायेंगे तो वो उसी तरफ आकर्षित होंगे|
इतिहास का बीच का दौर काफी खौफनाक है| मानवता का संदेश देने वाले ईसा को सूली पर चढाने का दौर है| ज़मीदारों ने किसानो का किस हद तक शोषण किया बहुत पहले की बात नहीं है| बेशक मानवजाति को बहुत आगे जाना है लेकिन आज हम जहाँ हैं उसे भी स्वीकार करना होगा| यदि हम अपने आज पर कृतज्ञ नहीं हैं तो बेहतर भविष्य की कल्पना कैसे कर सकते हैं|
सतयुग यानी सत्य का युग .. सत्य सनातन है|
दार्शनिक मत में भारतीय धर्म में वर्णित एक साथ चलते हैं| ये दुनिया हमेशा सत्व रज और तमोगुण प्रधान रहती है| ये बात अलग है कि हर युग में एक गुण प्रधान होता है| कलयुग तमोगुण प्रधान है लेकिन कुछ संतो का मानना है कि कलयुग का समय समाप्त होकर हम सतयुग की तरफ बढ़ रहे हैं या हो सकता है कि हम सतयुग में प्रवेश कर चुके हों एक मत ये भी कहता है कि ये ट्रांजीशन युग हैं कलयुग और सतयुग के बीच का काल|
युगों के फेर में न पड़ते हुए मानव को अपने अंदर के सतयुग की खोज करनी है| वास्तव में तो सभी युग अंदर ही हैं कभी हम सतयुग में जी रहे होते हैं कभी कलयुग में|
हमारे विचार भाव और कृतित्व ही युग का निर्माण करते हैं| हम बाहर जैसा देखते हैं वैसे ही अंदर हो जाते हैं| हमारी दृष्टि सत्य पर होगी तो हम कलयुग में भी सतयुगी हो जायेंगे|
रही बात कल्कि अवतार की तो अवतार प्रथक व्यक्ति हो ज़रूरी नहीं| जैसे कोरोना के रूप में रावण घर घर तक पहुच रहा है| वैसे ही आत्मचेतना के विकास के मार्ग पर चलते हुए घर घर में अवतार पैदा हो सकते हैं हो रहे हैं|
आज मानवजाति की चेतना अब तक के सबसे श्रेष्ठ स्तर पर है|
आज आबादी का एक बड़ा वर्ग जागरूक हो गया है| मानवीय और धर्मरक्षक हो गया है| वो हर व्यक्ति जो सन्मार्ग पर है, देश हित और जनहित को मूल मानते हुए इमानदारी और लगन से अपना कर्तव्य निभा रहा है| उसमे "कल्कि" अवतार प्रकट हो चुका है|
अब भगवान किसी एक व्यक्ति में अवतरित नहीं होंगे| क्यूंकि इंसानियत का दुश्मन रावण जैसा कोई "एक" राक्षस नहीं आज भगवान हर सतोगुणी व्यक्ति के अंदर अवतरित होंगे| राम कृष्ण बुद्ध महावीर जीसस हम सबके अंदर ही आयेंगे|
