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ईश्वर का सही पता



अतुल विनोद

यूं तो ईश्वर तक पहुंचने के अनेक रास्ते हैं। लेकिन ईनमें से उस परम ईश्वर तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं है। ये पगडंडियां हैं जो हमने बनाई। उसका बनाया मार्ग अंतिम है जिसका हमें  पता नही चलता। 

परमात्मा जिसका न आदि है न अंत, ना तो कोई शुरुआत है न ही कोई एंड। 

जो भी रास्ते हमने बनाये हैं वह परमात्मा तक पहुंचा देंगे? नहीं कतई नही ।  

क्योंकि हमारे द्वारा निर्मित रास्ते अंतिम पाथ नहीं है,अल्टीमेट वे नहीं।

अल्टीमेट गॉड को हासिल करना है तो रास्ता अल्टीमेट ही होगा। और अल्टीमेट रास्ता मनुष्य बना नहीं सकता क्योंकि उसका मनुष्य को पता ही नहीं है, तो उस तक पहुंचने का रास्ता कैसे बनाएगा। हां वो मिल सकता है कैसे वो आगे बताऊंगा। 

जिस भी रास्ते पर हम चलते हैं वो रास्ता ईश्वर ने नहीं बनाया। क्योंकि ईश्वर के बनाये रास्ते का वर्णन नही किया जा सकता। यदि वर्णित रास्ता ईश्वर ने बनाया होता तो हम उस रास्ते पर चलकर उस तक पहुंच ही गए होते। परमात्मा तक जो भी पहुचा है मनुष्य के बनाये मार्ग के पार जाकर पहुचा है।

वो जो परमात्मा है उसे क्या कहा जाए? उसे तो परमात्मा भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह शब्दों के परे है।

उसे हम क्या नाम देंगे हमारा हर नाम उसके अस्तित्व के आगे बौना साबित होगा।
 
उस सर्वव्यापी सर्वस्पर्शी सर्वग्राही सर्वशक्तिशाली परमपिता परमात्मा का कोई आकार हो सकता है क्या? 

इतनी बड़ी शक्ति को शब्दों में पिरोया जा सकता है क्या?

उसे नाम दिया जा सकता है क्या? 

उसका चित्र बनाया जा सकता है क्या?

जिसका कोई थाह नहीं, जो हर बंधन से परे है, जो अभेद है, जिसमें कोई भेद नहीं।

आकृति तो उसकी बनाई जा सकती है जिस के अलावा भी कुछ मौजूद हो। 

एक व्यक्ति या वस्तु की इमेज बनाई जा सकती है क्योंकि A4 साइज की तस्वीर में उसके अलावा भी बहुत कुछ बचता है। 

जो सब कुछ है क्या उसकी आकृति बनाई जा सकती है?

नहीं 

क्योंकि आकृति बनाने के लिए कुछ छोड़ना पड़ेगा? कुछ बचाना पड़ेगा?

लेकिन जो सर्वस्व है जिसके बाद कुछ बचता ही नहीं है। कुछ शेष  ही नहीं रह जाता तो उसे कैसे कोई कूची उकेर सकती है।

ऐसा नही कि जिसे चित्र में ढाला गया वो भगवान नहीं हैं। है, क्यों नही है क्योंकि हर एक अस्तित्व उसी का अंश तो है। तो मंदिर में भी वो है। मंदिर उससे अलग नही। 

उस परमात्मा को सत चित आनंद भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसमें असत, अचैतन्य, दुख विषाद भी समाहित है। 

उसमे सृजन भी है उसमें विस्फोट और विनाश भी है। 

दुनिया परमात्मा के नियमों से बंधी हुई है लेकिन स्वयं परमात्मा किसी नियम से बंधा हुआ नहीं। लेकिन फिर भी वो नियमों से बंधा दिखाई देता है। वो बिना बन्धन के नियमों को मानता और मनवाता है।

परमात्मा को किसी भी मजहब, पंथ, मत, संप्रदाय में बांधा नहीं जा सकता। 

कोई उंगली उठाकर किसी एक दिशा में परमात्मा के होने का इशारा नहीं कर सकता, जिस दिशा में भी आप परमात्मा के होने का दावा करेंगे उसके विपरीत भी वो मौजूद होगा। 

उसे ना चलकर प्राप्त किया जा सकता है ना ही बैठकर।

क्योंकि उसे प्राप्त करने की कोई एक सॉलिड विधि नहीं। क्योंकि वो विधियों के भी पार है। लेकिन कई बार विधि से उसका मार्ग पकड़ भी आ जाता है। जैसे तीर से कभी तुक्का जग जाए। 

सारी विधियां उसके आगे छोटी हैं। परमात्मा को खोजने के लिए कहीं जाया नहीं जा सकता। क्योंकि ऐसा कोई स्थान नहीं है जहां परमात्मा नहीं है। आप उसे कहां खोजने जाएंगे। जहां से जाएंगे वहां भी उसे छोड़कर जाएंगे।

परमात्मा को लेकर जो भी ज्ञान मौजूद है वह अधूरा है। इसीलिए सनातन धर्म ने घोषणा की कि जो उसे जानने के प्रयास में हार गया और खुदको अज्ञानी करार दिया वही ज्ञानी है। उसे जानने का दावा करने वाला सबसे बड़ा अज्ञानी है। 

वेद कहते हैं कि पूर्ण में से भी पूर्ण निकाल दो तब भी वह पूर्ण बचा रहता है, ऐसा है परमात्मा। 

उस परमात्मा को परमात्मा से बाहर कर दो तब भी बचा हुआ परमात्मा उतना ही शेष रहेगा।

उसे हर वक्त याद भी नहीं रखा जा सकता। ना ही उसे यादों में सीमित किया जा सकता है।

उसे ना तो बदला जा सकता है न घटाया बढ़ाया जा सकता है।

उसकी बनाई दुनिया हर वक्त बदलती है, घटती बढ़ती है।

जबकि वो चिरस्थाई है। उसका न आदि है न अंत। 

उसका कोई विकल्प नहीं।

हम उस से संवाद नहीं कर सकते क्योंकि संवाद उससे होता है जो कहीं और बैठा हो।

लेकिन जो हर जगह बैठा है। हर जगह मौजूद है। अंदर भी है, बाहर भी है, संवाद में भी है, जीभ में भी है, मस्तिष्क में भी है, मन में भी है, आत्मा में भी है। उससे कैसे संवाद किया जा सकता है?

एक क्षुद्र का विराट से कैसे संवाद होगा? 

हमारे संवाद से उसे क्या फर्क पड़ने वाला है? 

सवाल यह उठता है कि जब वह इतना विराट है तो हमें फिर उसको प्राप्त करने की इच्छा ही छोड़ देनी चाहिए?

इतना भी निराश होने की जरूरत नहीं। 

कुछ करने और कुछ कहने से वह प्राप्त नही होगा। प्राप्त करने की बात भी गलत ही है।

लेकिन यदि हम कुछ ना करें कुछ ना कहें। उसे लेकर गढ़े गए शब्द विचार मान्यताएं धारणाएं छोड़ दें। उसको लेकर कुछ भी बाकी ना रखें।

तब उसकी उपस्थिति का अहसास हो सकता है। 

यदि अंदर की बेकार की दीवारों को गिरा दिया जाए, विचार और निर्विचार दोनों को ही खत्म कर दिया जाए। ना विचार ना निर्विचार की आकांक्षा । ना तो पाप की चिंता न पुण्य प्राप्ति का लोभ ।

जो भी हम करते हैं उसमें मैं, का भाव होता है। मंत्र, भजन, पूजा, पाठ, साधना, उपासना यह सब मैं के अंतर्गत आते हैं।

लेकिन जब मैं भी विसर्जित हो जाता है तब उसका प्रादुर्भाव होता है। और वो जब आता है तो खुदको खुदसे मिलाने के लिए खुद ही साधना करवाता है। तब व्यक्ति एक दर्शक हो जाता है। करने वाला भी वही करवाने वाला भी वही।  

जब तक मैं है तब तक वह दिखाई नहीं देता। हालांकि मैं में भी वह है लेकिन फिर भी मैं एक आभासी पर्दे में बदल जाता है। यही आभासी मैं की दुनिया माया कही गयी है। 

मैं को मैं से हटाओ तो मैं आत्मा को खड़ा कर देता है, फिर कहता है मैं नही आत्मा। लेकिन ये आत्मा की उद्घोषणा नही। आत्मा कभी नही कहती मैं शुद्ध बुद्ध चैतन्य "आत्मा" ये मन कहता है । क्योंकि आत्मा स्वयं को मैं मानती ही नही। 

जब यह भाव भी नहीं रहता कि मैं आत्मा। क्योंकि आत्मा और परमात्मा में भी तो कुछ भेद नहीं।

जहां भेद की दृष्टि खत्म हो जाए तभी वह प्रकट होता है।

जब मैं हूँ तब हरि नही अब हरि है मैँ नाहीं।

मनुष्य के बनाए हुए सारे रास्ते निरर्थक नहीं। क्योंकि हर एक व्यक्ति इस स्तर को नही समझ सकता। परमात्मा के इस महामार्ग तक पहुँचने के लिए पगडंडियों का सहारा लिया जा सकता है। 

गांव से हाईवे तक पहुचने के लिए ग्रामीण सड़क योजना का लाभ लिया जा सकता है लेकिन मेन रोड आते ही छोटी सड़क छोड़ देनी होती है।

मानव निर्मित योग साधनाएं पगडंडियां हैं जो आपको मैन रोड तक पहुँचा सकती हैं। 

आकार की साधना में भी बुराई नही। आकार भी हमें निराकार तक ले जाता है।

जैसे रामकृष्ण परमहंस को माँ काली की भक्ति ने मुख्य मार्ग तक पहुँचा दिया। उस मार्ग तक जो ईश्वरीय मार्ग है। उसके बाद भी वो अपनी माँ को छोड़ने तैयार नही थे। लेकिन उनके गुरु तोतापुरी ने आखिरकार मां काली को भी छोड़ने को मजबूर कर दिया। इसके बाद उनकी आगे की यात्रा शुरू हुई। 

निराकार तक पहुंचने के लिए आकार का भी आवलम्बन किया जा सकता है।

उसका मार्ग भक्ति से भी प्राप्त किया जा सकता है और ज्ञान से भी। योग में ज्ञान, भक्ति, लय, हठ, मंत्र सभी मार्ग समाहित हैं। इस योग से व्यक्ति कुण्डलिनी यानी शक्ति तक पहुचता है और ये शक्ति उसे शिव से मिलाती है। मिलाना भी न कहें एकाकार कर देती है। 

ये सब शब्द हैं जो मैंने कहे  लेकिन वो इन शब्दों के भी पार है। 

धन्यवाद

Atul Vinod