ज़िंदगी के हर कदम पर गुरु 🙏
निश्चित ही गुरु की हर जगह आवश्यकता है| आप आज तक जो भी सीखें हैं वो कोई न कोई व्यक्ति ही होगा| सबसे पहले आपने माँ से सीखा इसलिए माँ पहली गुरु है| अध्यात्म में आगे बढ़ने के लिए भी गुरु की आवश्यकता है| गुरु किताब भी हो सकती है व्यक्ति भी और आपकी चेतना भी अंदर की चेतना ही सबसे बड़ी गुरु है लेकिन उससे मिलने का तरीका भी तो आना चाहिए| गुरु प्राप्त करने से पहले विद्यार्थी भाव का होना ज़रुरी है वो कैसे आता है? इसके लिए मेरा नीचे दिया आर्टिकल पढ़ें -
निश्चित ही गुरु की हर जगह आवश्यकता है| आप आज तक जो भी सीखें हैं वो कोई न कोई व्यक्ति ही होगा| सबसे पहले आपने माँ से सीखा इसलिए माँ पहली गुरु है| अध्यात्म में आगे बढ़ने के लिए भी गुरु की आवश्यकता है| गुरु किताब भी हो सकती है व्यक्ति भी और आपकी चेतना भी अंदर की चेतना ही सबसे बड़ी गुरु है लेकिन उससे मिलने का तरीका भी तो आना चाहिए| गुरु प्राप्त करने से पहले विद्यार्थी भाव का होना ज़रुरी है वो कैसे आता है? इसके लिए मेरा नीचे दिया आर्टिकल पढ़ें -
जीवन में यदि आप आध्यात्मिक या भौतिक ऊंचाइयों को छूना चाहते हैं तो आपको सबसे पहले अपने अवगुणों को पहचानना आना चाहिए| यह सूत्र व्यवहारिक जीवन में भी बहुत काम आता है| हम सब अपने आप को बहुत गुणी समझते हैं| कोई भी व्यक्ति अपने आप को नराधम नहीं मानना चाहता, सब खुद को पुरुषोत्तम ही समझते हैं| खुद को पर्फेक्ट और श्रेष्ठ मानने वाला व्यक्ति कभी भी अध्यात्म या किसी अन्य व्यवहारिक क्षेत्र में तरक्की नहीं कर सकता| जब तक हम अपने आप को धरातल पर नहीं रखेंगे अब तक हमारे अंदर विद्यार्थी भाव नहीं आ सकता, जानकारियों के ढेर पर बैठा व्यक्ति विद्वान कहला सकता है जो एक तरह का भ्रम मात्र है| विद्यार्थी भाव के बगैर किसी भी क्षेत्र में कुछ प्राप्त करने की संभावना है ना के बराबर है|
एक बार एक व्यक्ति ने एक संत से कहा, "महाराज मैं बहुत नीच हूं| मुझे कुछ ज्ञान दीजिए।" संत ने कहा, "अच्छा जाओ, जो तुम्हें अपने से नीच, तुच्छ और बेकार वस्तु लगे उसे ले आओ।" वो व्यक्ति गया और उससे सबसे पहले कुत्ते को देखा। कुत्ते को देखकर उसके मन में ख्याल आया कि मानव हं और यह जानवर, इसलिए यह मझ से जरूर नीच है। लेकिन तभी उसे खयाल आया कि कुत्ता तो वफादार और स्वामिभक्त जानवर है और मुझसे तो बहुत अच्छा है।
फिर उसे एक कांटेदार झाडी दिखाई दी और उसने मन में सोचा कि यह झाड़ी तो मुझसे तच्छ और बेकार है फिर खयाल आया कि कांटेदार झाड़ी तो खेत में बाड़ लगाने के काम आती है और फसल की रक्षा करती है। मुझसे तो ये भी बेहतर है। आगे उसे गोबर का ढेर दिखाई दिया।
उसने सोचा, गोबर ज़रूर मुझसे बेकार है। सोचने पर उसे समझ में आया कि गोबर से खाद बनती है, और वह चौका, आंगन लीपने के काम आता है। इसलिए यह मुझसे बेकार नहीं है। उसने जिस चीज को देखा वही उसे खुद से अच्छी लगी।
वो निराश होकर खाली हाथ संत के पास गया और बोला. 'महाराज, मुझे अपने से तुच्छ और बेकार वस्तु दूसरी नहीं मिली।' संत ने उस व्यक्ति को शिष्य बना लिया और कहा कि जब तक तुम दूसरों के गुण और अपने अवगुण देखते रहोगे तब तक तुम्हें किसी के उपदेश की जरूरत नहीं।
यह बात हम सब पर भी लागू होती है, जब तक हम अपने अंदर सिर्फ गुणों को देखते रहेंगे तब तक हम आत्म-मंत्रमुग्ध रहेंगे, और जब हम अपने अंदर की बुराइयां व कमियां देखने लगेंगे हमारा अहंकार कम होने लगेगा, हमारे अंदर निश्चलता आने लगेगी, और हम दूसरों के प्रति आदर और सम्मान से भर जाएंगे हमारी विनम्रता ही हमें हमारे मार्ग पर आगे ले जाएगी| जो विद्यार्थी बन गया उसे पग पग पर गुरु के दर्शन होंगे |
