सृष्टि के आरंभ से कैसे जुड़ा है योग? कौन हैं आदियोगी? परम शिव हिरण्यगर्भ ने क्यूँ दिया योग का सन्देश
…अतुल विनोद
योग और यौगिक क्रियाएं पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो रहे हैं, लेकिन इस योग की शुरुआत कैसे हुयी? दरअसल योग किसी को किसी ने सिखाया नहीं है, योग की विधियाँ तो हर एक मनुष्य की सुप्त चेतना में आदिकाल से मौजूद हैं| योग मनुष्य को जन्मजात मिलता है| कई बार आप बच्चे को स्वभाविक रूप से योग क्रियाएं करते हुए देखते होंगे| योग चेतना की उच्च अवस्था में स्वयम घटित होता है| आज भी जब किसी की कुण्डलिनी(सुप्त चेतना, आत्मशक्ति ) जागृत हो जाती है तो उसे नाना प्रकार की योग क्रियाएं स्वयं होने लगती हैं| एक से बढ़कर एक योग, आसन, मुद्रा व बंध खुद ब खुद होते हैं| योगी की जागृत कुण्डलिनी उसकी श्वास प्रश्वास की गति को अलग अलग प्रकार से परिवर्तित करती है| कभी श्वास अंदर रुकता है, तो कभी बाहर| कभी एक नाक से श्वास चलती है तो कभी दूसरे नासारंध्र से| इसका मतलब ये हुआ कि योग कि विधियाँ किसी ने विकसित नहीं की| मानव चेतना में उसके मन, मस्तिष्क, शरीर व आत्मा के विकास के लिए ये विज्ञान उसके अंतरतम में एक कोड के रूप में उसके उद्भव के साथ ही मौजूद था|
मनुष्य को श्वास लेना किसने सिखाया? मनुष्य के शरीर का आंतरिक तन्त्र को किसने विकसित किया? किसने इतना विलक्षण मस्तिष्क विकसित किया? क्या किसी मानव ने खुद अपने शारीरिक मानसिक व अध्यात्मिक सिस्टम का विकास किया? यहाँ तक कि जो जीव जंतु ज्ञान का “ज्ञ” भी नहीं जानते उनका तन्त्र भी विलक्ष्ण है| इन सब बातों का अर्थ ये है कि योग कोई विधि नहीं है जो विकसित की गई हो ये तो विधि के विधान के अंतर्गत उसके इस विलक्ष्ण स्वरूप में सुप्त रूप में मौजूद रहती है| विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ वेद कहते हैं कि आदि ब्रह्म हिरण्यगर्भ ने योग का सबसे पहले उपदेश दिया, हिरण्यगर्भ यानी जिससे संपूर्ण सृष्टि पैदा हुई|
“हिरण्यगर्भ” को एक ज्योतिर्मय अंडाकार आकृति के रूप में वर्णित किया जाता है| वैज्ञानिकों के अनुसार भी इस सृष्टि की उत्पत्ति एक अंडाकार पिंड से हुई| वेद कहते हैं कि क्षुब्द(स्पंदित) हुए हिरण्यगर्भ में महा विस्फोट हुआ और इस सृष्टि की रचना हुई| विज्ञान भी big-bang-theory में पिंड में विस्फोट से सृष्टि की रचना मानता है| क्वांटम थ्योरी भी विश्व की रचना का कारण विश्व पिंड परमशिव में वाइब्रेशन को मानती है|
हिरण्यगर्भ को आदियोगी भी इसलिए कहा जाता है क्यूंकि विश्व के इस परम शिव पिंड से सभी ३६ तत्व निकले
शिवतत्व
(१) शिवतत्व
(२) शक्तितत्व
विद्यातत्व
(३) सदाशिव,
(४) ईश्वर
(५) सद्विद्या
आत्मतत्व
(६) माया, (७) कला, (८) विद्या, (९) राग, (१०) काल, (११) नियति, (१२) पुरुष, (१३) प्रकृति, (१४) बुद्धि (१५) अहंकार, (१६) मन,
(१७-२१) श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, घ्राण (पञ्च ज्ञानेन्द्रिय)
(२२-२६) पाद, हस्त, उपस्थ, पायु, वाक् (पञ्च कर्मेन्द्रिय)
(२७-३१) शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध (पञ्च तन्मात्राएँ),
सब इसी महापिंड से प्रकट हुए| मानव की चेतना के विकास के साथ योग भी उच्च चेतना सम्पन्न ऋषियों में स्वयं उद्बोधित हुआ| गीता के चतुर्थ अध्याय के आरम्भ में श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
अर्थात् हे अर्जुन, इस योग का उपदेश सृष्टि के आरम्भ में सूर्य देवता को दिया गया था|
ऋग्वेद के दसवें मंडल में कहा गया है-
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।।
अर्थात् हिरण्यगर्भ से ही सबसे पहले सृष्टि का निर्माण हुआ। उसी ने पृथ्वी, स्वर्ग आदि सभी को धारण किया। क्योंकि हिरण्यगर्भ को सभी विद्याओं और कलाओं का प्रवर्तक माना जाता है। अर्थात् हिरण्यगर्भ’ ही योग के आदि प्रवक्ता हैं|
महाभारत में हिरण्यगर्भ को योग का उत्पत्तिकर्ता बताते हुए कहा गया है
हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः।। महाभारत 12/349/65
श्रीमद्भागवत में कहा है ‘इदं हि योगेश्वर योगिनी पुर्ण हिरण्यगर्भो भगवान जगाद यत्।। 5/19/13
अर्थात हे योगेश्वर, वैदिक-योग का आदि प्रवक्ता हिरण्यगर्भ परमात्मा ही है।
हठयोग प्रदीपिका मे योग परम्परा की प्राचीनता के संबन्ध में कहा गया है
श्रीआदिनाथाय नमोस्तु तस्मै येनोपदिष्टा। ह. प्र. 1/I
आदिनाथ अर्थात भगवान शिव ही योग के उपदेष्टा है।
वेद विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थों के रूप में जाने जाते हैं। माना जाता है कि पुराने समय में ऋषि मुनियों ने अपने योगबल एवं तपोबल के द्वारा ही ईश्वरीय ज्ञान को प्राप्त किया और उन्हें ग्रन्थबद्ध कर वेदों के रूप में प्रस्तुत किया।
एक मान्यता ये भी है कि सृष्टि की शुरुआत में अग्नि, आदित्य, वायु तथा अंगिरा नाम के चार ऋषियों को यह ज्ञान परमात्मा ने उनके अन्तःकरण में प्रकट किया। इसी कारण वेद को अपौरुषेय भी कहा जाता है। इससे योग का सृष्टि के आदि में ही प्रकटीकरण सिद्ध होता है। मुख्य रूप से वेदों की संख्या चार है. ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद तथा वेदों में अनेक स्थानों पर स्पष्ट प्रमाण देखने को मिलते हैं। योग ग्रन्थों की तरह वेदों में योग का प्रत्यक्ष वर्णन तो कम ही उपलब्ध है। लेकिन वेदों में मुख्य रूप से योगविद्या को प्राण विद्याएं, ब्रह्मविद्या आदि नामों से कहा गया है। वेदों में वर्णित ब्रह्मविद्या को विद्वानों ने योग विद्या का ही रूप माना है। ऋग्वेद में ब्रह्म स्वरूप परमपद को एक ऋचा में इस प्रकार बताया है
तद विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः।
दिवीय चक्षुराततम्।। 1/11/20
योग साधना का परम लक्ष्य ब्रह्म की प्राप्ति तथा ब्रह्म का साक्षात् कहते हुए, वैदिक संहिताओं ने ब्रह्म को ही सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी, सच्चिदानन्दरूप, अनन्त, निर्विकार आदि माना है। ब्रह्म और योग में साम्यता को ऋग्वेद में बताते हुए कहा है
ओम् खं ब्रह्म 40/17
अर्थात् ओंकार स्वरूप ही ब्रह्म है।
वेद में कुछ प्रसंग ऐसे भी मिलते हैं जो शरीर में स्थित चक्र, प्राण शरीर आदि विषय पर प्रकाश डालते हैं।अथर्ववेद में मानव शरीर को आठ चक्र एवं नव द्वारों वाली देवताओं की अयोध्यापुरी कहा गया है
‘अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या। अथर्व. 10/2/31
इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि वेदों में पर्याप्त रूप से योगचर्चा अलग-अलग जगहों पर की गयी है। हम कह सकते हैं कि जिस प्रकार वेद भारत का प्राचीनतम ज्ञान है, उसी प्रकार योग भी भारत का प्राचीनतम ज्ञान है
