Type Here to Get Search Results !

मृत्यु के बाद जीवन

भारतीय वेद पुराण या अन्य धर्मों के पवित्र ग्रंथ, लगभग सभी में मृत्यु पार के संसार के बारे में बहुत कुछ कहा गया है| इंसान हमेशा से परलोक के बारे में जानने को उत्सुक रहा है, यमलोक की कहानियां उसे हमेशा से रोमांचित करती रही हैं|
धरती के पार एक नहीं अनेक सूक्ष्म मंडल हैं| जिनमें मरने के बाद आत्माएं पहुंचती हैं| हमारे वातावरण के ऊपर एक के ऊपर सूक्ष्म -लोकों की परते हैं | ये परते एक नहीं कई हैं, हर एक लेयर एक मंडल है, हर परिमंडल में असंख्यों आत्माएं निवास करती हैं|
ये सभी मंडल भुवर्लोक के अंतर्गत आते हैं| सनातन दर्शन में सप्त लोक का वर्णन हैं
: सात लोक हैं जिसमें से तीन लोक
1.भू लोक
(धरती)
, 2.भुवर्लोक
(आकाश)
, 3.स्वर्लोक
(अंतरिक्ष) में ही प्रलय होता है
, जबकि 4.महर्लोक, 5.जनलोक, 6.तपलोक और 7.सत्यलोक
- ये
4 लोक प्रलय से अछूते रहते हैं।
पहले भूलोक में आत्मा तीन शरीरों से घिरी होती है| प्रथ्वी लोक में आत्मा के उपर पहला आवरण होता है कारण शरीर का उसके उपर सूक्ष्म शरीर होता है और सबसे उपर स्थूल शरीर होता है|
जिसे मृत्यु कहते हैं वह क्या है?
जब आत्मा से सबसे उपर का स्थूल शरीर का आवरण हट जाता है तो वह प्रथ्वीलोक से मृत मानी जाती है| आत्मा भौतिक शरीर छोड़ने के बाद अपने सूक्ष्म और कारण शरीर के साथ सूक्ष्मलोक की तरफ बढ़ जाती है| प्रथ्वी के उपर भुवर्लोक है| भुवर्लोक में अनेक सूक्ष्म परिमंडल हैं| आत्मा भुवर्लोक लोक में मौजूद सूक्ष्म-मंडलों में विचरण करने लगती है
यहाँ हम सिर्फ प्रथ्वी के ऊपर मौजूद सूक्ष्म-मंडलों की बात कर रहे हैं जो भुवर्लोक (आकाश) में स्थित हैं
इस ब्रह्माण्ड में मात्र एक भाग दृश्यमान(VISIBLE) है, बाकी तीन भाग अदृश्यमान (INVISIBLE) दुनिया का हिस्सा है।
मनुष्य तीन तरह के शरीर से मिलकर बना होता है|

पहला शरीर होता है भौतिक शरीर यानी फिजिकल बॉडी, जिसे हम देख पाते हैं, यह एक तरह का उपकरण है| जो पंच भूतों से मिलकर बना है| इन पञ्च भूतों में १६ रासायनिक तत्व आते हैं|
दूसरा शरीर होता है अभौतिक शरीर( Metaphysical Body या subtle body ) - अभौतिक शरीर ही सूक्ष्म शरीर है जो १९ सूक्ष्म तत्वों से मिलकर बना होता है| जिनमे बुद्धि मन चित्त अहंकार रस स्पर्श रूप गंध जैसे सूक्ष्म तत्व शामिल हैं| सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर का नियंत्रण करता है।
कारण शरीर (Casual body) : तीसरा और मूल शरीर है| कारण शरीर स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर का बीज है।इसी के कारण से स्थूल और सूक्ष्म शरीर का निर्माण होता है।कारण से कार्य की उत्पत्ति होती है । प्रत्येक कार्य का कोई कारण होता है । कारण शरीर ही आत्मा का मूल शरीर है| इसे बीज शरीर भी कहते हैं| भौतिक शरीर के १६ तत्वों व् सूक्ष्म शरीर के १९ तत्वों के भाव इस कारन शरीर में मौजूद होते हैं|
जैसा कि मैंने पहले बताया सूक्ष्म जगत में भी कई लेयर्स या मंडल हैं, शुरुआत में साधारण मंडल आते हैं और धीरे-धीरे इनका स्तर बढ़ते बढ़ते उस मंडल तक पहुंचता है जो सर्वश्रेष्ठ माना जाता है|
सबसे उंचा मंडल हिरण्य मंडल कहलाता है जिसे ब्रह्म मंडल भी कहते हैं| इससे नीचे ऋषि मंडल, देव मंडल आदि आते हैं|
मृत्यु के बाद आत्मा अपने कर्म के अनुसार भुवर्लोक में स्थित सूक्ष्म परिमंडलों में पहुँचती है| इस वक्त आत्मा के साथ सूक्षम शरीर के १९ तत्व और कारन शरीर के ३५ भाव मौजूद रहते हैं|
सूक्ष्म लोक में मौजूद इन मंडलों में आवागमन भी होता है| सूक्ष्म लोक धरती से काफी बड़ा है| सूक्ष्म जगत में भी ग्रह, नक्षत्र, तारे हैं| सूक्ष्म जगत में भी दिन
-रात होते हैं जो पृथ्वी से ज्यादा लंबे होते हैं| सूक्ष्म लोक के उपरी मंडल बेहद सुंदर और व्यवस्थित है| सूक्ष्म जगत में पृथ्वी की तरह जलवायु बदलती नहीं है| चारों तरफ सूक्ष्म रूप से मौजूद खूबसूरत प्राकृतिक नजारे हैं| इस सूक्ष्म जगत के निचले मंडलों में कर्मफल के अनुसार निम्नस्तरीय जीवात्मायें ही रहती है| यहां जीव
-आत्माओं के कई तरह की स्वरूप दिखाई देते हैं परियां, मत्स्यकन्या, मछलियां, पशु, भूत, प्रेत व देवता भी यहीं रहते हैं|
अच्छी आत्माएं मुक्त रूप से कहीं भी आ जा सकती हैं| लेकिन बुरी आत्माएं जेल की तरह एक सीमित दायरे में ही मूवमेंट कर सकती हैं| निचले मंडल साधारण हैं यहां आत्माओं के बीच बहुत अधिक तालमेल नहीं रहता| लेकिन जैसे
-जैसे आत्माएं अपग्रेड होकर ऊपर के मंडलों में पहुंचती है, वहां क्रमशः अच्छे से अच्छा माहौल मिलता चला जाता है| इस जगत में आत्माओं की इच्छाभर से ही कार्य होते हैं| वहां हाथ और पैर चलाने की गुंजाइश नहीं रहती है क्यूंकि भौतिक अस्तित्व वहां नहीं रहता | स्थूल शरीर से मुक्त हुआ जीव यहीं पहुँचता है|
अब आपके मन एक और सवाल पैदा हो रहा होगा? आप यह जानने के लिए उत्सुक होंगे कि जो जीवात्माएं सूक्ष्म जगत में पहुंचती हैं, वह किस तरह दिखती है? जो भी जीव-आत्मा शरीर छोड़कर सूक्ष्म जगत में पहुंचती हैं | वह अपने आखिरी जन्म के भौतिक स्वरुप की युवावस्था जैसी दिखती हैं| कुछ जीवात्मा जिन्हें अपने वृद्धावस्था के स्वरूप से लगाव होता है वह उसी स्वरूप में वहां दिखाई देती है |
भौतिक जगत का ज्ञान हमारी 5 इंद्रियों से होता है लेकिन सूक्ष्म लोकों का ज्ञान छठी इंद्रिय से होता है| कहते हैं कि सूक्ष्म जगत के निवासी मनचाहा स्वरूप धारण कर सकते हैं| सूक्ष्म जगत में मौजूद आत्मायें धीरे-धीरे उन्नति करते हुए स्वर्ग-लोक में पहुचने की अधिकारी हो जाती हैं| इस लोक को कारण जगत भी कहते हैं| स्वर्ग लोक में आत्मा के लिए भगवान वैसे ही प्रकट होते हैं जैसी उसकी भावना होती है|
सूक्षम जगत में कई जन्मो के रिश्तेदार मित्र भी मिलते हैं| यहाँ आत्माएं पृथ्वी की गतिविधियाँ जान सकती हैं| मानव ६टि इंद्रिय के बिना इस लोक को नहीं देख सकता|
सूक्ष्म जगत में जीने के लिए ऑक्सिजन की ज़रूरत नही होती|
सूक्ष्म जगत में आत्माएं अपने पूर्व जन्मों के किसी भी परिचित को उसको अपनी अंतर्दृष्टि से पहचान लेती है| सूक्ष्म जगत में जीवन की अवधि पृथ्वी लोक से बहुत ज्यादा होती है यहां पर आत्माएं 500 से 1000 साल तक जीती है|

कारण जगत सूक्ष्म जगत से भी सूक्ष्म होता है| कारण जगत यानी स्वर्ग जगत में जाने के लिए आत्माओं को सूक्ष्म शरीर को भी छोड़ना पड़ता है| | सूक्ष्म जगत से कारण जगत में प्रवेश यानी आत्मा का एक और प्रमोशन, लेकिन कई आत्माएं डिमोशन पाकर फिर से भौतिक जगत में पहुंच जाती हैं|
मृत्यु के बाद शरीर एकदम हल्का हो जाता है क्योंकि भौतिक शरीर का बोझ हट जाता है| ऐसे में सिर्फ सूक्ष्म और कारण शरीर से घिरी आत्मा अपने आप को हल्का महसूस करती है| उन लोगों की आत्मा ज़यादा हल्की होती है जो लोग संसार के मोह से कम बंधे होते हैं| जैसे बुजुर्ग, लेकिन जो लोग संसार के मोह ममता से ज्यादा बंधे होते हैं जैसे युवा, उनके भौतिक शरीर के कुछ परमाणु आत्मा के साथ चिपके रह जाते हैं| ऐसे लोगों की आत्मा में सूक्ष्म और कारण शरीर के साथ कुछ मात्र में भौतिक शरीर के कुछ कण जुड़े रह जाने के कारण वह हल्का हल्का सा दिखाई देता है| इसी को हम भूत कहते हैं|
जिनकी वासनाएं, इच्छाएं बची रह जाती हैं| उन्ही भौतिक कण मरने के बाद आत्मा से पूरी तरह अलग नहीं होते| इसलिए वह हल्का सा जीवित, एक छाया की तरह दिखाई देता है| इसी को हम भूत,प्रेत कहते हैं| वो आत्मा एक साये की तरह किसी किसी को नज़र आ सकटी है|
आत्मा जगत में नई आत्माओं को पुरानी और वरिष्ठ आत्माएं गाइड करती है| नई आत्माएं पहले यहां असहज महसूस करती हैं| वापस अपने शरीर में जाना चाहती हैं|
लेकिन जब शरीर नष्ट हो चुका होता है तो आत्माओं को यहां रहने को मजबूर होना पड़ता है| इसीलिए सनातन धर्म में शरीर को नष्ट करने का विधान है| खास बात यह है जिन्हें जन्म मृत्यु का भौतिक जीवन में ही ज्ञान हो जाता है वह आत्मा मरने के बाद अपने पुराने शरीर से बहुत ज्यादा मोह नहीं रखती|
सूक्ष्मलोक में आत्माओं को पिछले जीवन का लेखा-जोखा बताया जाता है| उसे बताया जाता है कि वह पहले कितने जन्म ले चुका है| सूक्ष्म जगत में सैकड़ों वर्ष तक की आयु पूरी करने के बाद आत्मा को अपना सूक्ष्म शरीर भी छोड़ना पड़ता है और सिर्फ कारण या भाव शरीर के साथ उसे अगले लोक की तरफ प्रस्थान करना पड़ता है| जैसे भौतिक शरीर भौतिक जगत में नष्ट हो जाता है वैसे ही सूक्ष्म शरीर सूक्ष्म जगत में नष्ट हो जाता है और बचता है तो सिर्फ कारण शरीर जिसे भाव शरीर भी कहते हैं| यहाँ आत्मा सूक्ष्म शरीर के १९ तत्वों से भी मुक्त हो जाती है| आत्मा के साथ अब सिर्फ कारन शरीर के ३५ भाव बचे रह जाते हैं|
स्वर्ग में कारण शरीर के साथ पहुची आत्मा बहुत ताकतवर होती है| जब आत्मा कारण शरीर भी छोड़ देती है तो उसे मुक्ति या मोक्ष कहते हैं| तीनो शरीरों से मुक्त आत्मा परमानन्द प्राप्त करती है| मुक्त आत्मा ब्रह्म शरीर में मिल जाती है|

ब्रह्म के सागर में तैरती हुई आत्मा पूर्णता मुक्त होती है| उसके साथ तीनों शरीरों का कोई बंधन नहीं होता वह सर्वव्यापक होती है| वह परम तत्व के साथ एक रूप हो जाती है| ना तो यहां प्रकाश होता है ना ही अंधकार ना तो विचार होता है ना भाव|
अविकसित आत्मा को 3 तीनों शरीर से बाहर निकलने के लिए पृथ्वी से सूक्ष्म जगत,सूक्ष्म जगत से कारण जगत में कई चक्कर लगाने पड़ते हैं| कई बार पूर्ण मुक्त आत्मा ब्रह्म की इच्छा से भौतिक जगत के लोगों के उद्धार के लिए अवतार लेती है|
अतुल विनोद