जब जब जिस जिस देश में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है जो अपने अंतर की यात्रा करते हैं| तब तब वह देश आगे बढ़ा है| अंतर की यात्रा का नाम है आध्यात्म, अध्यात्म को ठीक ठीक ढंग से समझ लेने पर किसी भी देश समाज और परिवार की उन्नति हो सकती है| समस्याएं तब बढ़ती है जब व्यक्ति अध्यात्म(आध्यात्मवाद) से नीचे गिर कर मैं में (भौतिकवाद) अटक जाता है| मेरी जाति, मेरा धर्म, मेरी प्रजाति, मेरा घर, मेरा बिजनेस, मेरा काम, मेरी सत्ता| जिस देश में धर्म समाज जो व्यक्ति में मैं की प्रधानता आ जाती है उस देश का पतन शुरू हो जाता है| जिस व्यक्ति में मैं रूपी संसार की प्रधानता हो जाती है उस व्यक्ति का पतन भी शुरू हो जाता है| व्यक्ति उसी को सबसे बड़ा मानता है जो द्रश्य्मान है, प्रचलित है, लिखित है|
दुनियादारी कहती है कि खुद को सबसे आगे रखो, लेकिन अध्यात्म कहता है कि खुद को सबसे पीछे रखो|
घर संसार कहता है कि मैं, असल धर्म संसार कहता है कि मैं नहीं तू!
आज कितने लोग या धर्म पंथ हैं जो तू की बात करते हैं|
आश्चर्यजनक बात है क्योंकि प्रचलित धर्म और व्यक्तित्व विज्ञान में खुद को आगे रखना सिखाया जाता है| आकर्षण का केंद्र बनना सिखाया जाता है| सबके सामने अपना इंप्रेशन, धाक , चमक बढ़ाने के तरीके बताए जाते हैं| लेकिन अध्यात्म में इसके ठीक उल्टा कहा जाता है|
प्रचलित धर्म अध्यात्म से कोसों दूर है क्योंकि उनमें मैं, मेरा धर्म, मेरी संस्कृति, मेरी परंपरा, सब कुछ जो मेरा है वहीं सर्वश्रेष्ठ है| उसी को मुझे आगे बढ़ाना है का पाठ पढ़ाया जाता है| मेरा देवता या आराध्य पुरुष सबसे श्रेष्ठ है बल्कि उसे मानने वाला मैं भी सबसे बेहतर हूं| और मैं जैसा मानता हूं वही सत्य है| यहीं से उस धर्म और उस धर्म के मानने वाले का पराभव शुरू हो जाता है|
दरअसल आज के धर्म की थ्योरीज़ के केंद्र में व्यक्ति खुद है| सनातन स्प्रिचुअल थ्योरी के केंद्र में परमात्मा है|
आध्यात्म का विज्ञान व्यक्ति को खुद से भागना नहीं सिखाता| अध्यात्म परहित में स्वहित खोजता है| भौतिकवाद सिर्फ स्वहित खोजता है, लेकिन ये स्वहित ही सारे फसाद की जड़ है|
नीति शास्त्र का पूरा विधान त्याग पर आधारित है| मुश्किल यह है कि भौतिक दुनिया पहचान पर टिकी हुई है| इस पहचान को कैसे खत्म किया जाए जो बड़ी मुश्किल से बनी है?
अध्यात्म कहता है कि भौतिक स्तर से ऊपर उठे बगैर उस परमात्मा शक्ति का अनुभव मुश्किल है| भौतिक स्तर हमारी पहचान,व्यक्तित्व और ईगो से मिलकर बना है| अपनी पहचान व्यक्तित्व और अहंकार को छोड़कर ही व्यक्ति अपने अंतर की सूक्ष्म यात्रा कर सकता है|
निश्चित ही सीमाओं से परे जो सत्ता है उसका ज्ञान सीमाओं में बंधे व्यक्तित्व से नहीं हो सकता|
कहने और पढ़ने में अध्यात्म और भौतिक जगत के नियमों में जमीन आसमान का अंतर नजर आता है लेकिन वास्तव में यह दृष्टि का भेद है, मर्म एक ही है|
मैं में केंद्र व्यक्ति दिखने में खुद का भला करता हुआ नजर आता है, लेकिन स्वार्थ से खुद का भला भी नहीं होता| परमार्थ में दूसरों के भले में भी खुद का भला छुपा हुआ है|
आध्यात्मिक नियम भौतिक जीवन को भी पुष्ट करते हैं| व्यक्ति को हमेशा आध्यात्मिक धर्म की जरूरत होती है| हम हमेशा भौतिक जगत में लिप्त नहीं रह सकते| कोरी भौतिकता इस लोक को भी खराब करती है और परलोक को भी|
भले ही आध्यात्मिकता से इस लोक में थोड़ी बहुत कमीबेशी नजर आए, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम इहलोक और परलोक, भौतिक जीवन और आध्यात्मिक जीवन, दोनों के लिए बेहतर साबित होते हैं|
यह दुनिया - पुरुष और प्रकृति, शिव और शक्ति, स्थूल और सूक्ष्म, अभौतिक और भौतिक , डार्क मैटर और नॉर्मल मैटर, दो स्तरों से मिलकर बनी है|
विज्ञान भी कहता है कि दुनिया का २० प्रतिशत हिस्सा नॉर्मल मैटर है, यानी भौतिक पदार्थ जो दिखता है | और इस दुनिया का 80 फ़ीसदी हिस्सा डार्क मैटर है, यानी सूक्ष्म पदार्थ जो नहीं दिखता, इसी को आध्यात्मिक द्रव्य कहते हैं|
यदि हम सिर्फ नॉर्मल मैटर यानी भौतिक पदार्थ को साधेंगे तो सिर्फ 20% तक पहुंचेंगे| बाकी 80 फ़ीसदी डार्क मैटर यानी आध्यात्मिक सत्ता की अवहेलना हो जाएगी|
इसलिए कहा गया है कि अध्यात्म को केंद्र में रखो, क्योंकि आध्यात्मिक सत्ता, भौतिक सत्ता से अधिक महत्व रखती है|
मनुष्य का जन्म प्रकृति(भौतिक, स्थूल, नार्मल मैटर, ) से ऊपर उठने के लिए है| खास बात यह है कि प्रकृति से ऊपर उठने के लिए व्यक्ति को बाहर जाने की जरूरत नहीं है| मनुष्य के अंदर ही पुरुष(सूक्ष्म,अध्यात्मिक,डार्क मैटर, God पार्टिकल) मौजूद है| बस व्यक्ति को अपने अंदर की यात्रा करनी है|
संसार पर विजय हासिल करने से ज्यादा जरूरी है अपने अंदर विजय हासिल करना| दूसरों को जीतने से ज्यादा महत्वपूर्ण है खुद को जीत लेना| आपके अंदर ही परमात्मा की सत्ता मौजूद है|
