हम सब शक्ति से ही संचालित हैं| हमारे अंदर एक ही शक्ति तीन रूप में कार्य करती है| इस त्रिगुणात्मक शक्ति को चेतना कहा जाता है| आत्मा, मन और प्राण चेतना के तीन भाग हैं| सामान्य रूप से चेतना बहिर्मुखी होती है| यानी इस चेतना का उपयोग सिर्फ भौतिक कार्यों में होता है| मनुष्य इस चेतना रूपी शक्ति का उपयोग भौतिक जगत के लिए करता है| आध्यात्मिक जगत के लिए यह शक्ति प्रस्तुत रहती है| इसी शक्ति को कुंडलिनी कहा जाता है| जब कुंडलिनी यानी चेतना अंतर्मुखी होकर मानव के आध्यात्मिक विकास में लग जाती है तब इसे शक्तिपात कहते हैं|
ध्यान साधना के क्षेत्र में शक्तिपात शब्द बहुत चर्चित है| शक्तिपात के जरिए व्यक्ति की चेतना का आंतरिक भाग क्रियाशील हो जाता है| चेतना अंतर्मुखी हो जाती है| आत्मा, मन और प्राण आध्यात्मिक उन्नति में लग जाते हैं|
चेतना को आंतरिक रूपांतरण में लगा देने का नाम ही शक्तिपात है| जब चेतना जागृत होकर व्यक्ति को खुद ही आध्यात्मिक उन्नति के लिए आगे ले जाने लगे तो समझिये शक्तिपात हो गया|
शक्तिपात किसी भी माध्यम से हो सकता है| एक अधिकारी गुरु अपनी शक्तियों से व्यक्ति की चेतना को अन्तर्मुखी कर क्रियाशील कर सकता है| व्यक्ति में पात्रता विकसित होने पर स्वयं परमात्मा शक्तिपात कर सकते हैं| व्यक्ति की साधना, आराधना से शक्तिपात हो सकता है| किसी अदृश्य सत्ता के द्वारा शक्तिपात हो सकता है| प्रारब्ध के संस्कारों के कारण शक्तिपात हो सकता है|
शक्तिपात यानी शक्ति का अंतर में संचार हो जाना, कुंडलिनी का क्रियाशील हो जाना, भारत में गुरु के माध्यम से शक्ति का संचार करने के लिए दीक्षा की परंपरा प्रचलित है|
जब तक व्यक्ति पात्र नहीं होगा और गुरु सक्षम नहीं होगा, गुरु के माध्यम से शक्ति का संचार नहीं हो सकता|
दुनिया कार्य और कारण के सिद्धांत पर चलती है| शक्ति के संचार के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है|
जैसे पावर हाउस से निकलने वाले तार की उर्जा बिना ट्रांसफार्मर के लोगों के घरों तक नहीं पहुंच सकती| इसी तरह ब्रह्मांड ऊर्जा के संचार के लिए व्यक्ति रूपी ट्रांसफार्मर की आवश्यकता होती है|
एक बुझा हुआ दिया दूसरे दिया को नहीं जला सकता| एक जागृत गुरु ही व्यक्ति की सुप्त कुंडलिनी को जागृत कर सकता है| गुरु पहले शिष्य में पात्रता विकसित करता है और फिर उसके माध्यम से शिष्य में स्वतः ही ऊर्जा का संचार हो जाता है|
शिष्य में पात्रता विकसित करने के लिए गुरु, मंत्र और साधनाएं प्रदान करता है|
दीप से दीप जलाना पड़ता है| व्यक्ति अपना दीप स्वयं बन सकता है| लेकिन इसके लिए प्रारब्ध और वर्तमान की साधना और तप में शक्ति होनी चाहिए|
दीक्षा यानि दी+ क्षा जिससे दिव्य ज्ञान मिलता है और पापों का क्षय होता है|
जब शक्तिपात हो जाता है तो जागृत चेतना- आत्मा, मन और प्राण के जरिए व्यक्ति के अंदर क्रियाशील होकर खुद ही आध्यात्मिक साधनाएं शुरू कर देती है| एक बार व्यक्ति के अंदर योग-साधनाएं शुरू हो जाए तो बाहर से उसे किसी तरह की विधियों की जरूरत नहीं रहती| चेतना व्यक्ति को खुद ही क्रियाएं कराती है|
शक्तिपात से शिष्य की बुद्धि में ज्ञान के बीज का अंकुरण हो जाता है| ज्ञान का यह बीज वृक्ष बनकर व्यक्ति की शक्ति को शिव से मिला देता है| इसका अर्थ है व्यक्ति अपने अंतर आकाश में ही आत्मा और परमात्मा के दर्शन कर लेता है| वो सर्वत्र उस परमात्मा शक्ति को देखने के योग्य बन जाता है|
