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मनुष्य जीवन का उद्देश्य

मनुष्य जीवन का असली उद्देश्य क्या है?
निर्जीव पत्थर से लेकर ब्रह्म तक 0 से लेकर 16 कलाएं अस्तित्व में है|
जिसमें ब्रह्म की एक भी कला नहीं है वह पत्थर है और जो ब्रह्म की सोलह कलाओं से युक्त है वह साक्षात परमात्मा है|
मनुष्य बीच में है लगभग 8 कलाओं से युक्त मनुष्य ना तो देवता है ना हीं जीव जंतु|
मनुष्य चाहे तो अपने स्तर से नीचे जा सकता है या ऊपर जा सकता है|
मनुष्य से नीचे जो प्राणी है उनकी बुद्धि और मन संकुचित हैं| स्वतंत्र होते हुए भी वो खाने और गोबर बनाने के अलावा और कुछ नहीं करते| ना ही वो कुछ कर सकते हैं, क्योंकि उनके अंदर परमात्मा की कलाओं का प्रतिशत आधे से कम है|
मनुष्य बीच में है इसलिए सुख और दुख दोनों भोगता है|
जो मनुष्य से ऊपर है वो सुख भोगता है वो देवता कहलाता है|
जो देवत्व से भी ऊपर है वह आनंद का भागीदार बनता है और जो उससे भी ऊपर पहुंच जाता है वह परम आनंद का हकदार हो जाता है|
हम चाहें तो अपने स्तर से नीचे गिर सकते हैं| अपने जीवन को सिर्फ काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह में फंसकर गवा सकते हैं| तब हम जानवरों की तरह हो जाएंगे जिनकी बुद्धि सुप्त है मन संकुचित है|
हम चाहें तो अपने स्तर से ऊपर उठ सकते हैं| अपने कर्मों से सुख के भागीदार बन सकते हैं| उससे भी ऊपर उठकर आनंद और परम आनंद के भागीदार बन सकते हैं|
यदि हमें नीचे जाना है तो बस खाओ पियो मौज करो ईश्वर को भूल जाओ| फिर सिर्फ धन कमाओ चाहे वह ईमानदारी से मिले या बेईमानी से|
ऊपर जाने का रास्ता कठिन है| वहां हर बात का ख्याल रखना पड़ेगा क्या अच्छा है? क्या बुरा क्या सत्य है? क्या मिथ्या? क्या धर्म है? क्या अधर्म?
हर कदम विचार करके रखना पड़ेगा
जो पहाड़ के शिखर पर पहुंचकर प्रकृति के नजारों का आनंद लेना चाहता है| उसे थोड़ी तकलीफ तो भोगनी पड़ेगी| रास्ते में आने वाले परेशानियों का भी सामना करना पड़ेगा
समय बहुत कीमती है| इस समय का या तो हम दुरुपयोग करें या सदुपयो हमारे ऊपर निर्भर करता है|