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भक्त और भगवान के बीच संवाद: 8 , हम कौन हैं और क्या बनना चाहते हैं?

 भक्त और भगवान के बीच संवाद: 8



हम कौन हैं और क्या बनना चाहते हैं?
जीवन की रचना हमारे विचारों, शब्दों और कर्मों से होती है, और हम अपने भविष्य को गढ़ सकते हैं अगर हम सकारात्मक सोचें, बोलें और विश्वास करें।
भगत: क्या हम अपनी मंजिल तक पहुंचेंगे चाहे कुछ भी हो?"
भगवान: "हां, तुम गलत नहीं हो सकते। अगर तुम्हारा लक्ष्य मैं हूं, तो तुम कभी मुझे चूक नहीं सकते।"
भगत: "हमें डर है कि कहीं हम 'नरक' में न चले जाएं।" भगवान: "यह दिलचस्प है कि तुमने पहले से ही खुद को उस डर में डाल रखा है ताकि उससे बच सको।"
भगत: "आप क्यों दुनिया को ठीक नहीं करते?"
भगवान: "क्योंकि यह तुम्हारा काम है। तुम्हारे पास दुनिया को बदलने की शक्ति है।"
भगत: "लेकिन यह बहुत कठिन है, नकारात्मक विचारों को नियंत्रित करना इतना आसान नहीं है।"
भगवान: "तुम्हारे लिए यह संभव है। जैसे तुमने खुद को नकारात्मक सोचने की आदत डाली है, वैसे ही तुम सकारात्मक सोचना भी सीख सकते हो।"
भगवान जीवन की रचना और उसका महत्व बताते हैं:
सोच: "जो तुम सोचते हो, वही तुम बनाते हो।"
बोल: "जो तुम बोलते हो, उसे साकार करते हो।"
कर्म: "जो तुम करते हो, वही तुम्हारी सच्चाई बनती है।"
भगवान कहते हैं, "सच में, जीवन एक रचना है, खोज नहीं। तुम हर पल अपनी सच्चाई बना रहे हो, चाहे तुम्हें इसका एहसास हो या न हो।"
भगवान ने यहाँ स्पष्ट किया है कि वे कोई आदेश या हुक्म नहीं देते, बल्कि हमें संकेत देते हैं कि हम घर वापस कैसे लौट सकते हैं। भगवान के अनुसार, हमें किसी आज्ञा को मानने की आवश्यकता नहीं है ताकि हम स्वर्ग पहुंच सकें, क्योंकि स्वर्ग कोई गंतव्य नहीं है, बल्कि वह अवस्था है जिसे हमें यहीं और अभी महसूस करना है। हम पहले से ही उस स्थिति में हैं, परंतु उसे पहचानना और स्वीकार करना ही असली समझदारी है।
इस संवाद में, भक्त ने भगवान से वही प्रश्न पूछा जो हर इंसान सदियों से पूछ रहा है—"स्वर्ग में कैसे पहुंचा जा सकता है?" इस पर भगवान का उत्तर यह है कि स्वर्ग कोई स्थान नहीं है जिसे प्राप्त किया जाना है, बल्कि वह अवस्था है जिसे समझा और अनुभव किया जाना है। लोग अक्सर सोचते हैं कि उन्हें अपनी वर्तमान स्थिति से कहीं और जाना होगा ताकि वे स्वर्ग को पा सकें, लेकिन यह भ्रम है।
भगवान बताते हैं कि "स्वर्ग अब यहाँ है"—बस हमें इसे समझने और महसूस करने की आवश्यकता है। भक्त ने जब पूछा कि यदि स्वर्ग यहीं है, तो दुनिया इतनी अव्यवस्थित क्यों है और उसे यह अनुभव क्यों नहीं हो रहा, तो भगवान ने उत्तर दिया कि हम उस चीज़ का अनुभव नहीं कर सकते जिसे हम जानते नहीं हैं। यह एक चक्र है: जब तक आप किसी चीज़ को नहीं जानते, तब तक आप उसे अनुभव नहीं कर सकते, और जब तक आप उसे अनुभव नहीं करते, तब तक आप उसे जान नहीं सकते।
भगवान ने यह भी स्पष्ट किया कि संन्यास का सही अर्थ आत्म-संयम नहीं है, बल्कि उसे छोड़ देना है जिसका आपके जीवन में कोई उपयोग नहीं है। संन्यासी वह नहीं होता जो इच्छाओं को मारता है, बल्कि वह होता है जो अपनी इच्छाओं को समझता है और यह देखता है कि कौन सी इच्छाएं उसकी सेवा नहीं कर रही हैं।
भगवान ने यह भी कहा कि "जैसा तुम देखते हो, वैसा ही तुम अनुभव करते हो।" अगर तुम किसी चीज़ का विरोध करते हो, तो उसे और सजीव बना देते हो। लेकिन अगर तुम उसे ध्यान से देखते हो, तो उसकी असली सच्चाई प्रकट हो जाती है और वह भ्रम मिट जाता है।
हम जो कुछ भी अनुभव कर रहे हैं, वह हमारा स्वयं का निर्माण है, और हम हर क्षण यह तय कर रहे हैं कि हम कौन हैं और क्या बनना चाहते हैं।
तब भक्त कहता है-
'मुझ अंतहीन महासमुद्र में विश्वरूपी नाव अपनी ही प्रकृत वायु से इधर-उधर डोलती है।' 'भ्रमति स्वान्तवातेन न मम अस्ति असहिष्णुता। 'अब मैं जान गया कि यह स्वभाव ही है। कोई मेरे विपरीत मेरे पीछे नहीं पड़ा है। कोई मेरा शत्रु नहीं है जो मुझे अशांत कर रहा है। ये मेरे ही स्वभाव की तरंगें हैं। यह मैं ही हूं। यह मेरे होने का ढंग है कि कभी इसमें लहरें उठती हैं, कभी लहरें नहीं उठतीं; कभी सब शांत हो जाता है, कभी सब अशांत हो जाता है। यह मैं ही हूं और यह मेरा स्वभाव है।
मय्यनंतमहांभोधौ जगद्वीचि: स्वभावत:।
उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षति:॥
भक्त: "हे भगवन, इस अंतहीन महासमुद्र में, जहाँ मेरा जीवन एक नाव की भांति है, यह विश्वरूपी नाव मेरी ही प्रकृत वायु से इधर-उधर डोलती है।"
भगवान: "भ्रमति स्वान्तवातेन न मम अस्ति असहिष्णुता। यह तुम्हारी अपनी ही प्रकृति है जो तुम्हारे अनुभवों को दिशा देती है।"
भक्त: "अब मैं जान गया, प्रभु, कि यह स्वभाव ही है। कोई मेरे विपरीत नहीं है, कोई शत्रु नहीं है जो मुझे अशांत कर रहा है। यह मेरे ही स्वभाव की तरंगें हैं जो मुझे विचलित करती हैं। यह मैं ही हूं, और यह मेरा ही होना है।"
भगवान: "मय्यनंतमहांभोधौ जगद्वीचि: स्वभावत:। उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षति:॥ यह सत्य है, पुत्र। संसार की लहरें स्वाभाविक हैं—वे उठें या गिरें, इससे न तुम्हारी वास्तविकता पर कोई प्रभाव पड़ता है और न ही मेरी। ये लहरें तुम्हारे भीतर से ही आती हैं, और शांत भी तुमसे ही होती हैं।"
भक्त: "हे प्रभु, अब समझ में आया कि यह सब मेरे ही स्वभाव का खेल है। कभी शांत, कभी अशांत—यह मैं ही हूं और यही मेरे होने का ढंग है।"
भगवान: "तुम्हारी समझ अब परिपक्व हो गई है, प्रिय। जब यह अनुभव हो जाता है कि यह सब स्वभाव की ही क्रिया है, तब भीतर शांति और संतुलन आ जाता है। यही सत्य का मार्ग है।"
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