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मानव अभीप्सा: ऋग्वेद और श्री अरविन्द दर्शन

 

मानव अभीप्सा: ऋग्वेद और श्री अरविन्द दर्शन 

मनुष्य हमेशा से ही अपने अस्तित्व से परे, किसी गहरे अर्थ और सत्य की तलाश में रहा है। यह जिज्ञासा, जिसे हम अभीप्सा कह सकते हैं, ऋग्वेद के मंत्रों और श्री अरविन्द के दर्शन में भी प्रकट होती है।

ऋग्वेद में, हम उषा देवी के रूप में अभीप्सा के दर्शन करते हैं। वह ज्ञान और प्रकाश की देवी है, जो अंधेरे को दूर करती है और सच्चाई को प्रकट करती है। ऋषि उषा से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें सच्चे ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की ओर मार्गदर्शन करे।


"वह उनके लक्ष्यों का अनुकरण करती है जो परे की ओर जा रहे हैं, वह आनेवाली उषाओं की शाश्वत परंपरा में सर्वप्रथम है--जो जीवित है उसे प्रकट करती है, किसी मृत को जगाती हुई उषा विस्तृत हो रही है..." (ऋग्वेद १. ११३ .८, १०)

श्री अरविन्द दर्शन में अभीप्सा:

श्री अरविन्द का दर्शन भी मानव अभीप्सा को महत्व देता है। वे मानते हैं कि मनुष्य केवल एक भौतिक प्राणी नहीं है, बल्कि उसके अंदर एक दिव्य चेतना भी है। यह दिव्य चेतना ही अभीप्सा का स्रोत है, और यह हमें परम सत्य और आनंद की ओर ले जाने का प्रयास करती है।

उदाहरण:

"मानवजाति के ये सतत आदर्श उसकी सामाना अनुभूति का खंडन करते हैं और साथ ही साथ उन उच्चतर और गहरी अनुभूतियों का समर्थन करते हैं जो मानवजाति के लिये असामान्य हैं और जो अपने पूरे संगठित रूप में किसी क्रांतिकारी व्यष्टिगत प्रयास या विकसनशील व्यापक प्रगति द्वारा हीं पाये जाते हैं।"


ऋग्वेद और श्री अरविन्द दर्शन दोनों ही हमें सिखाते हैं कि अभीप्सा मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह हमें प्रेरित करती है कि हम अपने से परे कुछ खोजें, और अपनी पूरी क्षमता को प्राप्त करें।


अग्नि देव और दिव्य शक्ति का महत्व:

  • अग्नि देव ज्ञान, परिवर्तन और प्रेरणा के देवता हैं।
  • दिव्य शक्ति ब्रह्मांड की रचनात्मक और शक्तिशाली शक्ति का प्रतीक है।
  • दोनों मिलकर मानव जीवन में आध्यात्मिक विकास और आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया को प्रेरित करते हैं।
  • वे हमें अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर और मृत्यु से जीवन की ओर ले जाते हैं।
  • यो मर्त्येष्वमृत ऋतावा देवो देवेष्वरतिर्निधायि: मर्त्यों में जो अमर्त्य है, और जिसे ऋत पर अधिकार है वह एक देव है और हमारी दिव्य शक्तियों में सक्रिय ऊर्जा के रूप में हमारे अंदर प्रतिष्ठित हो गया है।
  • ऊर्ध्वो भव प्रति विध्याध्यस्मदाविष्कृणुष्व दैव्यान्यग्रे: हे शक्ति, तू ऊपर उठ, हे अग्नि, समस्त आवरणों को भेद डाल, हमारे अंदर दिव्य वस्तुओं को प्रकट कर।

  • पहली ऋचा (ऋग्वेद 1.113.8-10):
  • उषा देवी का वर्णन:

    • परायततीनामन्वेति पाथ आयतीनां प्रथमा शश्वतीनाम्: उषा उन लोगों के मार्गों का अनुसरण करती है जो परे जाते हैं, वह आने वाली उषाओं की शाश्वत परंपरा में सबसे पहले है।
    • व्युच्छन्ती जीवमुदीरयन्त्युषा मृत कं चन बोधयन्ती: उषा जो जीवित है उसे प्रकट करती है, किसी मृत को जगाती हुई उषा विस्तृत हो रही है।
    • कियात्या यस्मया भवाति या व्यूषुर्यार्याच नूनं व्युच्छान्: वह पहले प्रदीप्त उषाओं और अब प्रदीप्त होने वाली उषाओं में सामंजस्य लाती है तो उसका विस्तार क्या है?
    • अनु पूर्वा: कृपते वावशाना प्रदीध्याना जोषमन्याभिरेति: वह प्राचीन प्रभातों की इच्छा करती है और उनके प्रकाश को परिपूर्ण बनाती है, अपने आलोक को प्रक्षिप्त करती हुई वह आने वाली शेष सभी उषाओं के साथ संपर्क साध लेती है।

    उषा देवी का महत्व:

    • उषा देवी ज्ञान और प्रकाश की देवी हैं।
    • वे अंधेरे को दूर करती हैं और सच्चाई को प्रकट करती हैं।
    • वे ऋषियों को सच्चे ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की ओर मार्गदर्शन करती हैं।
    • वे मानव जीवन में परिवर्तन और प्रगति का प्रतीक हैं।

    दूसरी ऋचा (ऋग्वेद 4.1.7; 4.2.1; 44.5):

    अग्नि देव और दिव्य शक्ति का वर्णन:

    • त्रिरस्थ ता परमा सत्ति सत्या स्पार्हा देवस्य जनिमान्यग्ने: इस जगत् में स्थित इस भागवत शक्ति के त्रिविध परम जन्म हैं, वे सच्चे हैं, वे वाछनीय हैं।
    • अनन्ते अन्त: परिवीत आगाच्छुचि: शुक्रो अर्यो रोरुचान: वह पूरी तरह से खुला हुआ शाश्वत में विचरता है और विशुद्ध, देदीप्यमान और परिपूर्ण करता हुआ वह चमकता है।
    • यो मर्त्येष्वमृत ऋतावा देवो देवेष्वरतिर्निधायि: मर्त्यों में जो अमर्त्य है, और जिसे ऋत पर अधिकार है वह एक देव है और हमारी दिव्य शक्तियों में सक्रिय ऊर्जा के रूप में हमारे अंदर प्रतिष्ठित हो गया है।
    • ऊर्ध्वो भव प्रति विध्याध्यस्मदाविष्कृणुष्व दैव्यान्यग्रे: हे शक्ति, तू ऊपर उठ, हे अग्नि, समस्त आवरणों को भेद डाल, हमारे अंदर दिव्य वस्तुओं को प्रकट कर।

    अग्नि देव और दिव्य शक्ति का महत्व:

    • अग्नि देव ज्ञान, परिवर्तन और प्रेरणा के देवता हैं।
    • दिव्य शक्ति ब्रह्मांड की रचनात्मक और शक्तिशाली शक्ति का प्रतीक है।
    • दोनों मिलकर मानव जीवन में आध्यात्मिक विकास और आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया को प्रेरित करते हैं।
    • वे हमें अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर और मृत्यु से जीवन की ओर ले जाते हैं।

    दोनों ऋचाएं मानव जीवन में ज्ञान, प्रकाश, और आध्यात्मिक विकास के महत्व पर बल देती हैं। उषा देवी और अग्नि देव/दिव्य शक्ति हमें प्रेरित करते हैं कि हम अंधकार को दूर करें, सत्य की खोज करें, और अपनी पूरी क्षमता को प्राप्त करें।