शक्ति हमेशा से मनुष्य के लिए अबूझ पहेली रही है| हालांकि शक्ति के दम पर मानव ने बहुत तरक्की की है| शक्ति दो प्रकार की होती है| एक वह जो मशीनों में दिखती है और दूसरी को जो जीव जंतुओं में दिखती है| शक्ति का स्रोत एक ही है| लेकिन संसार में उसके दो रूप हो जाते हैं| बिजली और मशीनों में व्याप्त शक्ति अचेतन है| जो अपनी बुद्धि नहीं रखती| या अपनी बुद्धि का प्रयोग नहीं करती, निर्जीव,प्रसुप्त| मनुष्यों में व्याप्त शक्ति चेतन है, जीवित, जिसकी अपनी समझ होती है|
भौतिक जगत में शक्ति के अचेतन स्वरूप का प्रयोग किया जाता है| क्योंकि अचेतन शक्ति प्रयोग करने वाले पर पूरी तरह निर्भर होती है| इसलिए विज्ञान के लिए वो सुविधाजनक है| वो चाहे उसका जैसे इस्तेमाल करें| आध्यात्मिक जगत में शक्ति का स्वरूप चेतन है| जब शक्ति चेतन होती है तो उसकी स्वयं की समझ होती है| व्यक्ति उसका चाहे जैसे इस्तेमाल नहीं कर सकता| व्यक्ति आध्यात्मिक शक्ति को अपने अधिकार में नहीं ले सकता बल्कि उसे उस शक्ति के अधीन होकर काम करना पड़ता है|
भौतिक शक्ति अधिकार देती है और आध्यात्मिक शक्ति अधिकार लेती है| जैसे-जैसे आध्यात्मिक शक्ति को बढ़ाया जाएगा, वैसे-वैसे मनुष्य के मन का अपनी ही शक्तियों से अधिकार छूटता जाएगा| व्यक्ति वही कर पायेगा जो शक्ति चाहेगी| शक्ति वाही चाहेगी जो अध्यात्मिक नियमों में स्वीकार्य होगा| वो व्यक्ति का परिवर्तन कर देगी| उसे अपने अधिकार में ले कर शारीरिक और मानसिक स्तर पर ऐसी प्रोग्रामिंग करेगी, कुछ बदलेगी, कुछ जोड़ेगी, कुछ घटाएगी, कुछ हटाएगी| जो मनुष्य को आध्यात्मिक ऊंचाइयों की ओर ले जाए| ये अध्यात्मिक शक्ति प्राण है| जो शरीर और मन को उर्जा देती है| आत्मा से ही ये प्राण पैदा होता है| आत्मा ही अपनी परमात्म शक्ति से प्राण खींचती है|
प्राण ब्रम्ह की शक्ति है| प्राण पूरी दुनिया में मौजूद है| लेकिन शरीर को ये वायु के ज़रिये मिलता है| प्राण वायु मंडल में भी है वायु मंडल से बाहर भी| प्राण ही मन को कंट्रोल कर सकता है| प्राण से मन, मन से शरीर कंट्रोल होता है| शरीर मन और प्राण मिलकर चित्त बनते हैं| ये चित्त ही जीव है| आत्मा के कारण ही ये तीनो कनेक्ट होते हैं| आत्मा हमेशा कांस्टेंट रहती है| हमारी शक्ति बचपन से लेकर बुढ़ापे तक बदलती रहती है| लेकिन आत्मा स्थिर ही रहती है| जब आत्मा अन्य योनियों में रहती है तब भी उन प्रजातियों की शक्ति,प्रवृत्ति का प्रभाव उस पर नहीं पड़ता|
आत्मा सूर्य के सामान है| स्थिर, एक सामान, निर्विकार| भारतीय अध्यात्मिक, सांख्य, ज्ञान योग कहता है कि प्रकृति के मुख्य रूप से २४ रूप हैं| २४ रूपों में शक्ति के अलग अलग भेद दिखाई देते हैं| जैसे पृथ्वी में भी शक्ति है लेकिन सुप्त रूप में, अव्यक्त और अचेतन रूप में | इसी तरह अग्नि, जल और वायु भी में भी शक्ति है लेकिन अचेतन होने के कारण ये अपनी कोई समझ नहीं दिखाती | परमात्मा सत-चित्त-आनंद है| उसमे सभी शक्तियां निहित हैं|
मनुष्य में ये शक्ति चेतन है, इसीलिए इसे अध्यात्मिक शक्ति कहते हैं| साधारण मनुष्य में ये शक्ति बहुत ज्यादा समझ नही दिखाती| बस उसके ज़रूरी कामों के लिए इन्द्रिय,मन, बुद्धि और अहंकार को पोषण देती रहती है| जब ये पूरी तरह चेतन हो जाती है तब इसे कुंडलिनी, चेतना या आत्मा का जागरण कहते हैं| इस अवस्था में ये इन्द्रिय, मन, बुद्धि और अहंकार को अपने अधिकार में लेकर उनके विकारों और संस्कारों को दूर करने का अभियान चला देती है|
इसी वजह से योगी में अनेक तरह की क्रिया, प्रतिक्रिया होने लगती है इससे उसमे क्रियात्मक परिवर्तन दिखाई देने लगता है|
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