क्या आप ईश्वर से मुलाकात के लिए हैं बेताब
यदि आप किसी से कहें कि मैंने ईश्वर से बात की तो वो कहेगा, यह सब फिजूल की बातें हैं ईश्वर से तुम्हारी बात कैसे हो सकती है यह तो संभव नहीं है?
हम कैसे ईश्वर से बात कर सकते हैं? हम तो एक मनुष्य हैं, हमारी हैसियत ही क्या है ईश्वर से बात करने की?
एक बात विचार करने की है कि ईश्वर यदि अलग है, और ईश्वर से हम बात नहीं कर सकते, संपर्क और संबंध स्थापित नहीं कर सकते तब तो फिर ईश्वर की आराधना करना ही व्यर्थ है|
तब तो फिर ईश्वर की बात करना ही व्यर्थ है| क्योंकि जो हमसे अलग है वह हमारा कैसे हो सकता है|
धर्म ग्रन्थ कहते हैं जैसा पिंड वैसा ब्रम्हांड तुम्हारे अंदर ही “ईश्वर” है|
इस्लाम को मानने वाले अल्लाह को मानते हैं सब कुछ अल्लाह से संचालित है| सब कुछ अल्लाह ही है जो कुछ है वही है, वही है, वही है|
क्रिश्चियनिटी मानती है कि परमेश्वर ही सब कुछ है| वही संचालित करता है|
जो संचालित करता है वह क्या बिना हमसे कांटेक्ट में रहे बगैर हमें संचालित कर सकता है?
किसी को भी ओपरेट करने के लिए उसके कांटेक्ट में रहना ज़रूरी है|
किसी ना किसी रूप में संचालक को जिसे संचालित करना है उसके संपर्क में आना होगा|
बिना हमसे संपर्क किये परमात्मा हमें संचालित नहीं कर सकता|
जब वह हमे संचालित करने के लिए हमारे अंदर प्रवेश करता है तो निश्चित रूप से हम उससे संपर्क कर सकते हैं| हम उससे बात कर सकते हैं|
ठीक उसी तरह से बात कर सकते हैं जिस तरह से हम किसी अन्य व्यक्ति से बात करते हैं| इट्स सो सिंपल|
बहुत ही साधारण सी और आसान सी बात है|
यही वजह है कि ईश्वर से हम संदेश प्राप्त करते हैं|
हम जो कुछ भी उपयोग, उपभोग, अविष्कार कर रहे हैं | हम इतनी सारी भाषाओं का ज्ञान रखते हैं|
यह सब ईश्वर को एक्सप्लोर करके, उससे बात करके, उससे ज्ञान लेकर ही तो संभव हुआ है|
मानव सोचते हैं कि हम जो कुछ करते हैं वह अपनी बुद्धि के कारण करते हैं|
हमने जो भी अविष्कार, टेक्नोलॉजी डेवलप की अपनी बुद्धि से की|
यह सब ईश्वर का ही किया धरा है|
हम अपने आपको ईश्वर से अलग क्यों मानते हैं?
यदि हम अपने आपको ईश्वर से अलग मानते हैं तो फिर तो बात ही खत्म हो गई|
ईश्वर से बात करना बहुत आसान है|
ईश्वर से बात करने के लिए आपको कि कहीं जाने की जरूरत नहीं है|
इसके लिए आप अपने मन के दरवाजे को खोलिए| मन ही तो मध्यम है|
आपका मन दरवाजा है|
अब ईश्वर कैसे आपसे बात करेगा?
अपने अंदर ईश्वर मौजूद है इस पर आपको विश्वास करना पड़ेगा|
इस पर विश्वास कैसे होगा?
इस पर विश्वास करना होगा|
सोचिए कि आप कैसे संचालित हो रहे हैं|
और ऐसी कौन-सी शक्ति है जिसके कारण यह दुनिया चल रही है|
अपने मन के दरवाजे खुलेगे आपके शांत बैठने से, संस्कारों के विसर्जन से, वृत्तियों के निरोध से|
इतना सब संभव नहीं दिखता तो, शांत बैठें|
ना तो मन को इधर उधर दौडाएं न ही प्रतिरोध करें|
ना निरोध न प्रतिरोध|
बस शांत बैठने का अभ्यास करें| परमात्मा को अपने अंदर महसूस करें|
शुरुआत में आपका चेतन मन आपसे बात करेगा फिर अवचेतन फिर अचेतन …
धीरे धीरे मन के तल खुलते जायेंगे |
मन के दुसरे तल अवचेतन से ही ईश्वर से मुलाक़ात का सिलसिला शुरू हो जायेगा|
अवचेतन मन के ज़रिये आपसे आपके निकटतम ईश्वर यानि आपके जीवात्मा जगत के गाइड आपसे बात करेंगे| अचेतन मन के ज़रिये और उपर के ईश्वर/उच्चात्माओं से आपकी बात होगी|
याद रखिये मह के प्रत्येक दरवाजे पर ईश्वर खडा है| लेकिन उसे पीछे एक और दरवाजा मौजूद है जहाँ उससे उपर का ईश्वर खड़ा है| यही परमात्मा की लीला है| वो अपरम्पार है| आप अपने स्तर से नीचे जायेगे तो भी ईश्वर ही है उपर भी वही है| बस स्तर का फर्क है|
ईश्वर के अनंत स्तर हैं| अंत में सारे स्तर परमेश्वर में विलीन हो जाते हैं|
जो स्तरों से परे है वो परमेश्वर है|
सर्वत्र वही है वो अनंत मुख वाला है|
आप उसके सन्मुख हो जाएँ वो तो बात करने के लिए उपस्थित ही है|
