कभी भी आपकी हार नही होती … फिर कौन हारता है? किसका होता है अपमान? P ATUL VINOD
हम बात बात पर हार जाते हैं| छोटी सी बात पर बेइज्जत हो जाते हैं| ज़रा से अपमानजनक शब्दों से इज्जत खराब हो जाती है|
फिर कितना परेशान होते हैं?
कोई कुछ कहता नहीं कि सीने में आग लग जाती है| कई बार तो खाना पीना मुश्किल हो जाता है| बदले की आग में जल रहा तन बदन.. पल पल मारता है|
कहने वाला कोई और था, जुबान उसकी खराब होनी थी, लेकिन वो कहकर मस्त हैं हम पस्त हैं|
अपमान की आग कितना नुकसान कर देती है, पता ही नहीं चलता|
नस नाड़ियां कड़क हो जाती हैं| धडकने बढ़कर हार्ट को थका देती है| ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है|
कुछ लोग तो हर बात को दिल पर ले लेते हैं|
एक सज्जन को उसके बॉस ने डांट दिया| गलती नहीं थी फिर भी फटकार दिया| घर से लड़कर आये थे शायद| उतारा करके अपने काम में लग गए| भूल ही गए| लेकिन ये सज्जन तो असहज हो गये| गलती नहीं थी फिर भी कैसे डांटा, क्यूँ चिल्लाया? महोदय साहब के जाने के बाद स्टाफ के सामने खीज निकालने लगे, देख लूँगा| नौकरी ही छोड़ दूंगा| कुछ ने समझाया आज के दौर में नौकरी इतनी आसानी से नहीं मिलती| कुछ आग में घी डाल रहे थे, गलत किया बॉस ने|
सज्जन का काम में मन लगना बंद हो गया| मन फीका हो गया| गुस्से की आग में जलने लगे, घर पहुचे तो जरा सी बात पर पत्नी से झगड़ लिए| गाली गलौच हो गयी| पत्नी भी कम नही, बैग पैक कर लिया| बुला लिया माये के वालों को| सुबह आ भी गए, ससुराल चार बातें सुनाकर ले गये|
स्कूल चल रहा था सो बच्चे छोड गये| अब महोदय और परेशान, बॉस के प्रति नाराज़गी और बढ़ गयी, सब कुछ उसी की वजह से हुआ| इधर घर का काम करने की झल्लाहट, पत्नी माये के चली गयी कौन करेगा इतना? ससुराल वालों पर भी गुस्सा| नेगेटिविटी बहुत बढ़ गयी| घर से निकले, गुस्से में थे लेट भी हो गए थे| ध्यान कहीं और था, तो टकरा दी कार स्कूटर से| नया पंगा खड़ा हो गया|
सब कुछ उलटा पुल्टा हो रहा था| खून जल रहा था| दोपहर बाद ऑफिस पंहुचे अपने सहकर्मी को ये बात बताई, सहकर्मी ने साड़ी बातें बॉस को बताई, बॉस अब कूल थे उन्होंने केबिन में बुलाया| अपनी कही बात पर खेद जताया, कहा मैं तो भूल ही गया था, घर से लड़कर निकला था.. पता नहीं कब तुम पर उलट पड़ा, सोचा तुम दिल पर नहीं लोगे| मन में आया भी क्लियर कर दूं| कहने वाला था कि बुरा मत मानना, लेकिन कोई ज़रूरी कॉल आ गया और भूल गया| सब कुछ नार्मल हो गया|
लेकिन इन २४ घंटो में इस वजह से क्या क्या हो गया? घर झगड़ा, स्कूटर को टक्कर और सबसे बड़ा २४ घंटे का मानसिक आघात | दिल पर कितना लोड पड़ा होगा? उधर पत्नी और उसके मायेके वाले भी इसी दौर से गुजर रहे थे| गुस्से में फैसला तो ले लिया, ले गए लेकिन अहसास हुआ बात इतनी बड़ी नहीं थी|
ये सब क्यूँ हुआ?
बेइज्जती किसकी हुयी थी … बॉस ने शरीर पर कोई चोट दी थी? किसी तरह की आर्थिक कटौती की थी? काम ज्यादा करवाया था? किसी तरह का फिसिकल ट्रामा नहीं था, फिर ये मानसिक ट्रामा कैसे हो गया?
"ईगो" की वजह से ईगो हर्ट हो गया| होता यही है| अपमान अहंकार का होता है और हम परेशान हो जाते हैं|
दुनिया में कितने ही झगड़े फसाद, रोग, दोष, परेशानिया ईगो की देन हैं| तनाव, अवसाद का असली कारण भी ईगो ही है| आर्थिक परेशानियों के दौर में व्यक्ति क्यूँ टूट जाता है? क्यूंकि वो बुरे दौर में कम में गुजारा करने को तैयार नहीं होता|
मैं कार से चलाने वाला, स्कूटर से कैसे चलूँ| मैं कैसे लोकल में सफर करूँ? लोग क्या सोचेंगे? सबके सामने कह दिया? अब सब क्या कहेंगे? लोग क्या कहेंगे? क्या सोचेंगे, य ही सबसे बड़ी समस्या है|
फ़कीर मांगकर भी खुश रहता है क्यूंकि उसे परवाह नहीं कि लोग क्या कहेंगे| जिसे परवाह नहीं, उससे लोग भी कुछ नहीं कहते|
ईगो कम करना आसान नहीं| इसके लिए अध्यात्म ही एक मात्र रास्ता है| जब तक शरीर और शरीर और जुडी पहचान को बहुत ज्यादा मान्यता दी जायेगी, अहंकार सातवे आसमान पर रहेगा| जब ये बात समझ आये सब कुछ मिटना ही है| नाम और दाम छोड़ना ही है| हम कुछ भी नहीं, सिर्फ एक निर्भर प्राणी हैं, जिसकी हर एक साँस सिर्फ कृपा से मिलती है| उसका कुछ भी नहीं, शरीर किसी ने दिया, कपड़े किसी ने बनाये, भाषा किसी और ने इज़ाद की|
बार बार खुद को जानने की कोशिश करें| जब जीवन की ह्कीकत सामने आ जाती है तो अहंकार अपने आप कम होने लगता है|
अपनी असल पहचान क्या है? मैं कौन हूँ? आदि के जवाब मिल जाते हैं तो "अहम" निकलने लगता है|
अहम पूरी तरह शून्य नहीं हो सकता| जब तक शरीर है तब तक इसके होने का भान है, तब तक ईगो है|
एक समझदार मनुष्य जब ईगो की वास्तविकता से रूबरू हो जाता है तो वो उसके होते हुए भी उसके कारण होने वाले नुकसान को नियोजित कर लेता है|
यही एक आदमी की सफलता है वो ईगो की वजह से ट्रैप नही होता, होने भी लगे तो तुरंत अहसास करके बाहर निकल आता है|
आप भी कभी ईगो की जाल में फस जाएँ तो तुरंत जागरूक हो जाएँ|
जितने जल्दी आप होश प्राप्त कर लेते हैं उतना ही कम नुकसान होता है|
अपनी सांसों पर नियंत्रण रखें| इश्वर का स्मरण करें| जीवन की निस्सारता को याद करें| बार बार दोहरायें कि जीवन क्षणभंगुर है, इसलिए ईगो की वजह से खुदको कष्ट देना उचित नही|
भावनाओं के खेल को समझें| सुख में न उछले, दुःख में भी सम रहें| किसी ने अपमान किया है तो उसकी सजा उसे मिलनी चाहिए ना कि आपको| याद रखें आपको अपमान का बदला लेने की कभी ज़रूरत नही ईश्वर के विधान में अपमान करने वाले और मजाक उडाने वाला बड़ा गुनहगार होता है उसे उसकी सजा मिलती ही है| खुद उसकी चेतना भी उसे नहीं छोड़ती| कोशिश करें किसी के अपमानजनक शब्दों पर शांत रहें मुह से जवाब दें लेकिन मन से विचलित न हों, हो सके तो जवाब भी न दें बस सहज बने रहें|
सहज रहने से खराब वक्त भी गुजर जाता है| दुनिया बड़े बड़े पापियों को भूल जाती है| जेल यात्री भी वापस आकर समाज में प्रतिष्ठा बना लेते हैं| मान सम्मान प्रतिष्ठा जाते हैं तो समय उन्हें वापस भी कार देता है,, बस थोड़ा धैर्य चाहिए|
छोटी छोटी बातों से काल्पनिक हानि होती है, हम उसे सोच सोच कर बड़ा बना लेते हैं| सोचें की दूसरे के अपमान की कितनी घटनाएँ आपको याद हैं| इसी तरह मैं में खोये लोग आपके अपमान को भी याद नही रख पाते|
रिसर्च बताती है कि ९९ फीसदी मामलों में कोई हमारी इन्सल्ट नहीं करता, हम ही उसे कारण बनाकर खुदको HUMILIATE करते हैं|
रिश्तों में भी बात बात पर हर्ट होना बंद कर दें| बिना सामाजिक बंधन किसी के इतने आसक्त न हों कि उसके छोड़ देने से ही जिंदगी खत्म मालूम हो| किसी को भी अपनी जिंदगी न बनाये|
