Atul vinod
ध्यान कोई तकनीक नहीं है - ध्यान अनुभव है , ध्यान क्रिया नहीं है, ध्यान लगाया नहीं जाता - ध्यान लग जाता है| जब कुंडलिनी जागृत होती है तो वह असली ध्यान स्वयं लगवा देती है| लेकिन कुंडलिनी के लिए ध्यान प्राथमिकता में नहीं होता , हम जो ध्यान लगाते हैं वह जबरदस्ती का ध्यान है, उसकी एक सीमा होनी चाहिए, एक निश्चित सीमा के बाद, एक निश्चित समय के बाद, हमें कृत्रिम ध्यान रोक देना चाहिए और लगातार/जबरदस्ती ध्यान नहीं करना चाहिए, ध्यान के साथ प्राणायाम का,आसनों का, यम, नियम, प्रत्याहार और धारणा का अभ्यास भी करते जाना चाहिए यानी कंप्लीट डाइट लेनी चाहिए |
किसी भी तरह की ध्यान गतिविधि में लंबे समय तक बैठ जाना हमारे अहंकार को पोषित करता है और हम समझते हैं कि हम आध्यात्मिक हो गये हैं , इसी वजह से आप अलग तरह का व्यवहार करने लगते हैं लेकिन यह वास्तविक आध्यात्मिक प्रगति का लक्षण नहीं है |
याद रखिए ध्यान से दिमाग को शांत नहीं किया जा सकता , दिमाग को शांत करने के लिए पहले आपको यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार और धारणा के जरिए खुद को विचारों से मुक्त करना पड़ता है और जब आप यह सब कर लेते हैं तो ध्यान अपने आप लगने लगता है उसी को वास्तविक ध्यान कहते हैं |
