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गुरुकृपा। श्रीसद्गुरु की कृपा से सद्धिष्य दुर्गम साधन पथ को सुलभ कर लेता है।


 गुरुकृपा। श्रीसद्गुरु की कृपा से सद्धिष्य दुर्गम साधन पथ को सुलभ कर लेता है।


गुरु से दीक्षा द्वारा शिष्य का साधन सुलभ हो जाता है। यह गुरुकृपा ही वह दीक्षा है, जिसको कहते है- 'शक्तिपात-दीक्षा'। जिस कृपा से श्रीरामकृष्ण के स्वामी विवेकानन्द को स्पर्श करते ही उनको परमेश्वर की अनुभूति हुई, वह शक्तिपात-दीक्षा महा रहस्यमयी और आश्चर्यमयी है। वह महा पुरातन है।

जिस दीक्षा द्वारा गहनी- नाथ जी ने निवृत्तिराय को एक क्षण में ब्रह्म संपन्न बना दिया, जिससे रामानन्दजी के कबीर साहब को स्पर्श करते ही उनमें भक्तिभाव-प्रेम उदय हो गया, और जिसके द्वारा शंकराचार्य ने देखते ही हस्तामलक अपने आत्मा को पा लिया-आत्मज्ञानी बना लिया-वही है शक्तिपात-दीक्षा|

शक्तिपात अनादिकाल से चला आया ऋषि-मुनि-महर्षियों का एक परम गुप्त साधन है। अपने दिव्य ब्रह्मतेज को शिष्य में डालकर शिष्य को तुरंत ब्रह्मानुभूति कराना ही शक्तिपात रहस्य का अर्थ है।

महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में एक क्षेत्र है, जिसका नाम है 'जोगाई की अम्बा' । वहाँ की एक कथा : उस प्रदेश के जयपाल राजा की "रकाब में पाँव, ब्रह्म बताओ" ऐसी हठ पर मुकुन्द- राज योगी ने चाबुक से एक फटका मारकर ब्रह्मानु‌भूति करा दी थी। जैसे ऋषिलोग तपोबल से शाप देते (या आशीर्वाद देते) हैं, वैसे ही ज्ञानयोग के बल से शिष्य पर अध्यात्म शक्ति का संचार करना, उनके लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं है, और सच्चे परमार्थ पथिक के लिए अनानुभूति (अनअनुभूति) का विषय भी नहीं है। कोई भी संप्रदाय क्यों न हो, उसमें दीक्षा तो है ही। 'दीक्षा याने देना' ईश्वरानु भूति कराना यही उसका मुख्य अर्थ होता है। हरएक मानव में कुंडलिनी नामक एक दिव्य-शक्ति रहती है। उस शक्ति के दो रूप हैं। एक रूप व्यवहार को प्रकाश करता है, दूसरा रूप परमार्थ को साध्य करता है।

जब श्रीगुरु अपने शिष्य पर अध्यात्म-शक्ति के तेज को डालते हैं, तब उसकी वह परमार्थ शक्ति अपने आप क्रियाशील बनकर कार्य करने लग जाती है। इसका नाम 'कुंडलिनी का अंत क्रियाशील होना' है और यही दीक्षा या गुरुकृपा है।

श्रीगुरु में ब्रह्मानन्दमयी चितिशक्ति का पूर्ण रूप से वास है। चिति उसको कहते हैं, जिसमें परम स्वतंत्रता से विश्व को रचने का सामर्थ्य है। वह चिति ही भेद-अभेद-भेदाभेदमय होकर एक ही वस्तु से अनंत रूप में ब्रह्मांड को रचकर एक में अनेक, अनेक में एक करके, निर्विकार आत्मा में साविकाररूप जगत् को दिखाती है। इस कार्यकारिणी शक्ति के अनेक नाम हैं- चिति, महामाया, परब्रह्मरूपिणी, शिव की गौरी, राम की सीता, कृष्ण की राधा, नारायण की लक्ष्मी, ब्रह्मा की ब्रह्माणी, योगी की कुंडलिनी, कवि की कवित्वशक्ति, ज्ञानी की विद्याशक्ति और आत्मा की आनन्ददायिनी शक्ति ।

इस शक्ति बिना शक्त, और शक्त बिना शक्ति नहीं; दोनों एक ही हैं, भिन्न नहीं। जैसे राजा और राजा की शासन-शक्ति हैं, वैसे ही ये सब एक ही रूप हैं।
निर्गुण निराकार जो सत्ता-संभूति शुद्ध परम चैतन्य है, वह जब स्पंदयुक्त होती है, तब उसमें ही यह शक्ति क्रियाशील बन जाती है। वही परमात्मा की महिमारूप महाशक्ति श्रीकुंडलिनी है। उस कुंड- लिनी को क्रियाशील कर देना ही शक्ति- पात, अनुग्रह, दीक्षा या गुरुकृपा आदि संज्ञाओं से पुकारा जाता है, ।

योगवाशिष्ठ के निर्वाण प्रकरण में कहा है कि-
"दर्शनात् स्पर्शनात् शब्दात् कृपया शिष्यदेह के ।
जनयेद्यः समावेशं शांभवं सहि देशिकः ।।"

अर्थात् जिनके दीक्षारूप दर्शन, स्पर्श या मंत्र-उपदेश से शिष्य को आनन्दानुभूति होकर उसकी अंतरशक्ति जागती है, वे ही गुरु हैं।

"गुरोर्यस्यैव संस्पर्शात् परानन्दोऽ भिजायते ।
गुरुं तमेव वृणुयात् नापरं मतिमान्नरः ।।"

ऐसे गुरु से दीक्षा मिलने के बाद शिष्यों में अनेकानेक प्रकार के अन्तर-कार्य होते हैं। उनमें से कुछ क्रियाओं की जानकारी यहाँ गुरुभक्तिपरायण-गुरुप्रसाद प्राप्त शिष्यों के ज्ञान के लिए है।

गुरुदेव की अन्तर्शक्ति शिष्यों के अन्दर प्रवेश होते ही किसी को आनन्दानुभूति, किसी को चित्त की जड़ता, मूढ़ता या तो चंचलता आ जाती है। किसी को अंग प्रति अंग में नाना तरह के कार्य-जैसे आसन, मुद्रा, कम्प, नृत्यादि चेष्टाएँ- स्वयं होने लगती हैं। तब वह साधक आश्चर्यमुग्ध बन जाता है। कोई-कोई डर भी जाते हैं। थोड़ा समय सर्वांग में दर्द होता है। पेट में, हृदय में, शिर में अनेक तरह के कार्य होने लगते हैं। स्नायु का उड़ना, रोमांच होना, घ्यान लग जाना, निद्रा आ जाना इत्यादि चिह्न शुरू होते हैं। ध्यान में श्वेत, कृष्ण, खत, नील आदि अनेक रंग की ज्योतियों के दर्शन होते ही दिन-प्रतिदिन साधक का आनन्द बढ़ता जाता है और वह उल्लास से साघन में लगे रहता है। कभी ध्यान में अनेक मन्दिरों के, गिरिकंदराओं के और लोकांतरों के दर्शन भी होते हैं। ध्यान में एक अवर्णनीय दिव्य ज्योति के सतत दर्शन होते रहते हैं-वह ज्योति ब्रह्म की सगुणरूप ज्योति मानी जाती है।

"अकल्पितोद्भवं ज्योतिःस्वयं ज्योतिः
प्रकाशितम् ।
अकस्मादृश्यते ज्योतिस्तज्ज्योतिः
परमात्मनि ।।"

अर्थात्-यह ब्रह्मज्योति बिना कल्पना के प्रगट होती है। ऐसी स्वयं-प्रकाशित ज्योति अकस्मात् दीखती है। ऐसी अपने आप बिना कल्पना के ध्यान में आनेवाली ज्योति परमात्मा में अवस्थित है। इस दिव्य- ज्योति के अन्दर लोकांतर के दर्शन भी होते हैं, तब साधक पितृलोक, चन्द्रलोक, इन्द्र- लोक सब सत्य हैं, ऐसा समझने लगता है। दीक्षित साधकों में अष्टभाव भी जाग्रत हो जाते हैं। भावोन्मत्त होते ही मानो साधक अनन्त आनन्द के समुद्र में डुबकी लगाता और मस्त बन जाता है। दिनोंदिन साधना में उसका उत्साह बढ़ने पर अनन्त अनुभूतियाँ होने लगती हैं। ऐसी नयी-नयी अनुभूतियाँ होने से साधकों को दृढ़ता और साहस पूर्वक साधन करने का उत्साह एवं स्कृति मिलती है। ऐसा साधक न्यायोचित रीति से किसी भी व्यवहार में, किसी देश में और कहीं भी क्यों न जावे, सर्वत्र अपनी श्रद्धा के कारण वह अपने श्रीगुरु के दर्शन करता है। यहाँ में किसी जादू की बात नहीं कर रहा हूँ, न तो पुराण की कथा कह रहा हूँ। यह बिलकुल सत्य है कि परमात्मा सर्वदा सत्य, नित्य, परिपूर्ण व्यापक है। इस प्रत्यक्ष दिखनेवाले जगत् के अणु-अणु में परमात्मा व्याप्त है। इतना ही नहीं, जड़-चेतन समस्त जगत् भी चैतन्य आत्मा है।

"तदेव भवति स्थूलं स्थूलोपाधिवशा- त्प्रिये ।
स्थूलसूक्ष्मविभेदेन तदेकं
संव्यवस्थिततम् ।।

(शिवसूत्रविमाशिनी) जो सूक्ष्म है, वही स्थूलभाव में आ जाता है। जैसे चिति चित्त बन जाती है, वैसे ही चेतन जड़भाव बन जाता है। अर्थात् वह महाप्रकाश आत्मा स्थूल भाव से स्फुरने पर स्वयं ही चित्र-विचत्र विषयों के रूप में उपाधि-युक्त बनता है। व्यापक आत्मा ही व्याप्य बनता है। व्याप्य और व्यापक अलग नहीं, इसी से उपाधि चैतन्य से भिन्न नहीं है।

एक संत की (मराठी) कविता-'तुला वाली म्हणुका भुगुडी रे, वाली भुगुडींत तुं एक सोना रे'।

और वैसे ही एक हिन्दी काव्य में कवि कहता है- "गहनेको गढ़ाते कई सोने की भी तो जात है, सोना बिच गहना है, गहना बिच सोना है। भीतर भी सोना और बाहर भी सोना दिसे, सोना तुं अचल अनंत गहने को बिच
सोने भी तो जान लिजो, है। गहने को बरबाद किजो,
यारी एक सोना तामें ऊँच कौन नीच कौन ॥"

ऐसे ही अनेक दृष्टांत हैं। एक बूँद अन्न-रस से विचित्र शरीर की रचना हो जाती है। वस्त्र के सर्वांग में कपास से ही बना हुआ ताना और बाना है। वस्त्र में सूत है सूत में कपास है। इस तरह भगवान् स्थावरजंगमात्मक जगत् है। विश्व ही विश्वात्मा है। जगत् ही जगदात्मा है भूलोक ही वैकुंठ है।

बम्बई के प्रिन्सेस डॉक से छुटी हुई स्टीमर मंगलूर के बन्दर तक जाते हुए भी समुद्र तो एक ही है, स्टीमर समुद्र से अलग नहीं हुई है-समुद्र में ही है। वैसे ही शक्तिपात से दीक्षित साधक जहाँ-कहीं किसी देश में साधन करते हैं, ध्यान के समय अंतज्योंति में अपने गुरु या इष्ट को देखते हैं, तो उसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं, ना तो अतिशयोक्ति है। क्योंकि जैसे स्टीमर पानी में ही है, वैसे ही साधक के अन्दर जो चैतन्य है, वह सर्व देश, सर्व काल और सर्व स्थिति में उसके साथ ही रहता है। चिति के अन्दर साधक और साधक के अन्दर चिति है। चैतन्य सर्व- व्यापी होने से एक ही है। यह बात बिलकुल सत्य है। इसमें कोई नास्तिक के नाक- भौहे सिकोड़ने का भी कारण नहीं। इसमें कोई प्रोपेगेंडा, झूठा प्रचार नहीं, भुवा-बाजी नहीं, ना पाखंड है।

'तच्चमत्कार इच्छाशक्ति:' । (तंत्र- सार) अर्थात् भगवान की शक्ति अनन्त चमत्कारयुक्त है। वह अपनी इच्छा से साधकों में अनेक प्रकार की क्रिया कराती है। उसी क्रियात्मक स्थिति में अनन्त "चमत्कारी आसन, योग मुद्राएं और विभिन्न प्रकार के ध्यान नाड़ी-शोधन में सहायक होते हैं। इन क्रियाओं से नाड़ियाँ शुद्ध होकर रोगों को दूर करती हैं और प्राणायाम से सुषुम्ना नाड़ी खुलती है। जब प्राण और अपान समान होते हैं, तो योगी को समदर्शन प्राप्त होता है। वह 'मैं' के अहंकार से मुक्त होकर सर्वव्यापी चैतन्य का अनुभव करता है। गुरु कृपा से जागृत कुंडलिनी साधक को आनंद और मोक्ष प्रदान करती है। साधक को घर-द्वार त्यागने की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि कुंडलिनी उसका हमेशा रक्षण करती है।"

होता, मूर्तिमंत परमानन्द का विग्रह बन जाता है। वह शक्ति अपने को आप जानती और आप ही अपने को पहचानती है। ऐसी वह 'आमर्थात्मकता ज्ञानशक्तिः। (तंत्रसार) सर्व विश्व-ब्रह्मांड को अपने में रखकर आनन्दोल्लास में रहनेवाली है। वह शक्ति जिनमें क्रियाशील बन जाती है, उनके लिए क्या अप्राप्य है? उनको कौन-सा अभाव रह सकता है? क्योंकि वह सर्वा कारयोगित्वं क्रियाशक्तिः ।' (तंत्रसार)

मनचाहे आकार को धारण करनेवाली है। स्वशक्तिप्रचषोऽस्य विश्वम् '।।

(शिवसूत्रविर्माशनी) अर्थात्, अपनी स्वशक्ति से, बिना किसी साधनसामग्री, अनेक रूप में विश्व को रचनेवाली है। परमस्वतंत्रता से स्फुरनेवाली चिति जो परमेश्वरी योगमाया कुंडलिनी है, वह गुरुकृपा से जिनके हृत्कमल में क्रियाशील हो जाती है, उनके लिए मोक्ष तो साधारण वस्तु है, क्योंकि वह स्वयं ही मूर्तिमंत चिति रूप वन जाते हैं। यहाँ पाठकों को 'साधक चितिरूप बन जाता है' ऐसा पढ़कर आश्चर्य मानने का कोई कारण नहीं है। वस्तुतः यावत्मात्र जगत् चिति है। साधक चितिमय, साधन चितिमय, गुरु चितिमय, मंत्र चितिमय, प्राण चितिमय, क्रिया चितिमय; चितिमय आकाश, चितिमय वायु, चितिमय अग्नि, चितिमय जल, चितिमय पृथ्वी; चितिमय नभचर, चितिमय जलचर, चितिमय थलचर ; सारे जगत् के कारण और कार्य भी चिति ही है। "यथा चितिः विश्वं साधयति, चितिमासाद्य विश्वं भवति, चित्याचिश्व- मीश्वरः करोति चितेः विश्वंभवति, चितेः विकारोविश्वंभवति, चितौविश्वंस्थि- तमिति" ।।

तब चिदात्मामय विश्व में गुरुकृपा से पुनः चितिमय बनने में क्या बाधा हो सकती है?

सर्व वेदों का सिद्धान्त है कि 'अयमात्मा ब्रह्म' आत्मा ही परमात्मा है। जब सारा जगत् जगदीश है, तब गुरुपदिष्ट मार्ग से चिति या आनन्द की अनुभूति करना यह कोई कल्पित विचार नहीं है, बल्कि बिलकुल सत्य है। दादा गुरु श्री गंगई नाथ जी और समर्थ सद्गुरु श्री- सियाग जी की यही देन है। शास्त्रकारों ने 'गुरुर्वा पारमेश्वरी अनुग्राहिका शक्तिः ऐसा कहा है। शक्ति रूप में श्रीगुरु ही शिष्य के अन्दर दीक्षा के समय प्रवेश करते हैं। शिष्य में प्रवेश होते ही उसकी काया- पलट हो जाती है। शिष्य में प्रविष्ट हुई शक्ति मूलाधार चक्र से लेकर सहस्त्रार तक अनन्त प्रकार के विचित्र कार्य करती रहती है, और सदा उसके हृदय में वास करती है। शिष्य को इस शक्ति के कार्य का परिचय भी निरंतर होता रहता है।

कभी-कभी उसको प्रज्वलित चिता की अग्नि जैसा भासमान होता है, और अपने चारों तरफ सब कुछ जल रहा है, सब वस्तु में अग्नि लग गयी है, ऐसी अनुभूति ध्यान में होती है। ऐसे समय कोई-कोई साधक आसन छोड़कर उठकर भागने को तैयार हो जाते हैं। लेकिन आँखें खोलकर देखता है तो कहीं कुछ नहीं है। यह और ऐसे अनुभव भ्रमात्मक नहीं हैं, परन्तु एक सच्ची आध्यात्मिक अनुभूति हैं। इसके बाद अग्नि एक केशर या सुवर्ण रंग की दिव्य ज्योति जैसी बन जाती है और वह ज्योति बहुत काल तक याने साधन पूर्ण होने तक दिखती ही रहती है। इसी ज्योति के अन्दर अनेकानेक सिद्ध-महात्माओं के दर्शन होते रहते हैं और किसी किसी को ध्यानावस्था में अन्तराकाश के दिव्य ज्योतिर्मय प्रकाश में कोई ऋषि आकर मंत्र, औषधि, या फल दे जाते हैं। इस मंत्र से वह योगी किसी की भी आंतर शक्ति जागृत कर सकता है, औषधि से असाध्य रोग मिटा सकता है। ऐसे योगी संसार में बड़े उपकारीजन बन जाते हैं। लेकिन यह सभी साधक को नहीं मिलता। तदनंतर साधक को अनेक तरह के दिव्य संगीत सुनायी पड़ते हैं और संगीत सुनते सुनते ही लय-भाव का अभ्यास हो जाता है। नाद के लय होते ही साधक को परमानन्द की अनुभूति होती है।

वह नादानुसंधान श्रवण करते-करते योगी आपरहित, पररहित, एकरहित, अनेकरहित बन जाता है। उसकी साधारण अवस्थाएँ- जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति-कम हो जाती हैं और वह तुर्यावस्था में परम तारुण्य को प्राप्त हो जाता है, और तुर्यानन्द में मस्त बन जाता है।

'जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तभेदे तुर्याभोगसंभवः ।' (शिवसूत्रविर्माशनी ) यह है गुरुकृपाजन्य योग का फल ।

इस योग को सिद्धयोग भी कहते हैं, क्योंकि यह सिद्धजन द्वारा ही प्राप्त है। बिना सिद्धजन की कृपा के यह महादुर्लभ है। इसको महायोग भी कहते हैं, कारण इसमें सब योग के भाव आ जाते हैं और इसी से महायोग, सिद्धयोग, पूर्णयोग या परशिवयोग भी इसे कहते हैं। 'विस्मयो योगभूमिकाः'। (शिवसूत्रविर्मार्शनी) - गुरु- कृपा से निरतिशय परमानन्दमय वस्तुदर्शन सहज में होता है। यह अनुभव योगीजनों को अतिशय विस्मयजनक भासमान होता है। इस योग की पूर्णानुभूति में 'शिचतुल्यो जायते' । (शिवसूत्रविर्माशनी) साधक शिव के समान बन जाते हैं। जैसे भृङ्गी के संग से कीट मूंग बन जाता है, पारस के स्पर्श से लोहा सुवर्ण बन जाता है, पानी दूध में मिलकर दूध के समान बन जाता है, वैसे ही गुरुकृपा से, शिव-शक्ति योग से, जीव शिव बन जाता है। तब उस मानव के जाति, कुल, वर्ण आदि की स्मृति और देहमाव नष्ट हो जाते हैं, उसे स्वभावतः ही 'शिवोऽहम्' भाव स्फुरने लग जाता है।

गुरु से दीक्षित शिष्य साधन करते-करते ठीक ३, ६, ९ या १२ वर्ष में अपने में दिव्यता का अनुभव करता है, दिव्यानु भूतियुक्त बनता है। महाशक्ति कुंडलिनी हृदय में रहकर योगी को अनन्त प्रकार के भावों की अनुभूति कराती हुई किसी को कवि बना देती है, किसी को विद्वान बनाकर अप्रमेय अद्वितीय शास्त्रों की रचना कराती है, किसी को मदोन्मत्त प्रेम में नहलाती है। ऐसे योगी के सान्निध्य में सभी सहज सुख की अनुभूति करते हैं। वे जहाँ रहते हैं, वहाँ के वृक्ष-लताएँ भी बहुत फलते हैं, फूल भी बहुत खिलते हैं, खेती भी बहुत उपजती है। वहाँ का बन भी नंदनवन के सदृश सुन्दर, सदैव हरा भरा बन जाता है।

विश्व को विकसित करनेवाली श्रीपरशिव की शक्ति जहाँ पर भी क्रियाशील बनती है, वहाँ के झाड़-पान, फल-फूल सब सहज स्वभाव से ही खिल उठते हैं। महाराष्ट्र की संत जनाबाई का एक अभंग मुझे याद आया: "विठ्ठल
रुकमिणी तुम्हीं अखण्ड आणा ध्यानी, मग सुखा काय ऊणी। जाहले सोयरे त्रिभुवनी, मग सुखा काय ऊणी। रिद्धि सिद्धि वाहे पाणी, मग सुखा काय ऊणी ॥"

पूज्य जनाबाई ने अपने अभंग में जो गाया है, वह सर्वथा सत्य है कि उस योगी के
आसपास का सारा वातावरण योगमय, आनन्दमय, प्रेममय बन जाता है। प्रेम से, भक्ति से, वहाँ जो कोई भी जाता है, वह उस शक्ति से परिचित हो जाता है और शांतभाव का अनुभव करता है। यह सब महायोग का औदार्य है।

महाशक्ति कुंडलिनी जिनमें प्रवेश करके अपना परिचय देती है, वे साधक दिन-दिन बड़े ही उत्साह से, आनन्द से, महापुरुषार्थ से साधन करते हैं। क्योंकि, नये-नये चमत्कारजन्य अनुभवों से प्रेरित साधक अभ्यास भी नित्य-नियम से करने को लग जाता है। उसके हृदय में एक स्वतंत्र प्रेम का परिचय प्रकट हो जाता है। जैसे व्यसनी अपने व्यसन को कभी छोड़ नहीं सकता, नशा पाने पर ही स्थिर होता है, उसी तरह वे सिद्ध योग के साधक बिना साधना किये रह नहीं सकते। साधन करते-करते मूलाधार में स्थित कुंडलिनी शक्ति, चक्रों को भेदते-भेदते ललाट से ऊपर सहस्रार में जाकर किचित् कार्य- रूप नृत्य करते-करते शिव में मिलकर शिवा परशिव बन जाती है। जब कुंडलिनी- शक्ति सहस्रार में शिव में शांत हो जाती है, तब साधक का साधन पूर्ण हो जाता है। पूर्ण ही साधन पूर्ण है। और इस रीति से जब सहस्रार में समान-भाव में शक्ति पूर्ण स्थिर हो जाती है, तब शुद्ध विद्या का उदय हो जाता है।-

शुद्धविद्योदयाच्च क्रेशत्वसिद्धिः'। (शिव सूत्रविर्माशनी) शुद्ध विद्या का उदय होते ही ईशानुभूति हो जाती है। तदनंतर साधक अपने साघन-काल को भूल जाता है और साध्य परमेशानुभूति में मस्त रहता है। जैसे अज्ञान दशा में साधक अपने को दुखी, दरिद्री, अपूर्ण, भोक्ता, आदि शक्ति हीनता का अनुभव करता है, वैसे ही शक्ति जागृति के बाद अपने को पूर्ण, शिव, संपन्न, अभोक्ता, शक्तिशाली, प्रेममय, ईशरूप बना हुआ समझकर आनन्दोहम् करके नित्य नयी-नयी आनन्द-मस्ती में मस्त रहता है। उसे फिर जन्म-मरण के द्वन्द्व-रोग दर्शन नहीं देते। जिनकी कुंडलिनी जागृत हो गयी है, वे साधक स्वभावतः ही अन्दर से स्फूर्त हुई मस्ती में मस्त होकर मस्त बन जाते हैं। सिधु में पड़ा हुआ बिन्दु अपने चारोंओर पानी ही पानी देखकर पूर्णसिंधु बनकर शांतभाव को प्राप्त हो जाता है, वैसे ही साधक आनन्द की स्फूर्ति में सब जगत् को विश्वात्मामय देखता है।
' सों ममायं विभव इत्येवं परिजानतः । विश्वात्मनो विकल्पानां प्रसरेऽपि महेशता ॥" (ईश्वर प्रत्यभिज्ञ ।)

अर्थात्, यह प्रत्यक्ष भासनेवाला विश्वाडंबर मेरा ही याने परमेश्वर का ही वैभव- विलास है, परशिव का ही रूप है, ऐसा देखते-देखते वह साधक विकल्प दशा में भी सन्देहरहित रहता है। सर्व वस्तु में परशिव की स्फूर्णा को स्फुरित रूप में देखता है। आगे-पीछे, नीचे-ऊपर, चारों तरफ वह शिव को देखता है; शिव बिना कुछ नहीं जानता, वह शिव ही बना जाता है।

शिवो दाता शिवो भोक्ता, शिवं सर्वं इदं जगत् । शिवो यजति यज्ञश्च य शिव सोऽहं एव हि ॥

जय श्री गुरुदेव -