Type Here to Get Search Results !

धर्म-नियंत्रित जीवन: इच्छाओं का नियंत्रण और आत्म-साक्षात्कार

 

धर्म-नियंत्रित जीवन: इच्छाओं का नियंत्रण और आत्म-साक्षात्कार

मनुष्य की सीमित क्षमता और इच्छाओं की अपारता

चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, मनुष्य अपनी सभी इच्छाओं को पूर्ण करने में असमर्थ होता है। भोग, संग्रह और कर्म - इन तीनों प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति एक साथ संभव नहीं है।

इच्छाओं का वर्गीकरण और प्राथमिकता निर्धारण

इस स्थिति में, इच्छाओं का विवेकपूर्ण वर्गीकरण और प्राथमिकता निर्धारण आवश्यक है।

  • कौन-कौनसी इच्छाएं पूरी की जाएं?
  • कौन-कौनसी इच्छाओं को त्यागना होगा?
  • किन इच्छाओं को प्राथमिकता दी जाएगी?
  • किस एक इच्छा की पूर्ति से अन्य सभी इच्छाएं पूर्ण या समाप्त हो जाती हैं?

यह विवेक ही धर्म का आधार बनता है।

इच्छाओं के मूल उद्देश्य

भोग, संग्रह और कर्म की इच्छाओं का मूल उद्देश्य क्या है?

  • जीवन रक्षा: भूख, ठंड, निर्बलता आदि से बचाव के लिए सामग्री प्राप्त करना।
  • ज्ञान: अज्ञानता से मुक्ति और ज्ञान प्राप्ति के लिए शिक्षा, ग्रंथ, चिन्तन आदि।
  • आनंद: इन्द्रियों और मन को दुःख, चिंता से मुक्त रखकर प्रसन्नता प्राप्त करना।

ईश्वर की प्राप्ति: परम लक्ष्य

इन तीनों उद्देश्यों का सार ईश्वर प्राप्ति है।

अविनाशी जीवन, सर्वोच्च ज्ञान और अविनाशी आनंद - ये सभी ईश्वर में ही निहित हैं।

जो लोग ईश्वर को नहीं मानते, वे भी अनजाने में ही ईश्वर की ही कामना करते हैं।

धर्म का मार्गदर्शन

धर्म कर्म करने का मार्गदर्शन करता है। धर्म के अनुसार कर्म करने से पाप नहीं लगता और आत्मा शुद्ध होती है।

धर्म हमें अंतःकरण शुद्धि और विवेक की ओर ले जाता है।

भगवान की भक्ति और आत्म-साक्षात्कार

भगवान की भक्ति या भगवद्भाव से की जाने वाली उपासना से मोह-माया दूर होती है और भगवान का ज्ञान प्राप्त होता है।

भगवान सदैव हमारी रक्षा करते हैं और हमें जीवन देते हैं।

भूतकाल का त्याग और वर्तमान पर ध्यान

हमें भूतकाल में ना उलझते हुए वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

वर्तमान क्षण ही हमारा है, और भगवान कृष्ण ही हमारा एकमात्र रक्षक हैं।

निष्कर्ष

धर्म-नियंत्रित जीवन हमें इच्छाओं का नियंत्रण करने, आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने और मोक्ष की ओर अग्रसर होने का मार्ग प्रदान करता है।

Swami Akhandanand ji