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जीवन का उद्देश्य: परमात्मा की ओर अग्रसर :

 

जीवन का उद्देश्य: परमात्मा की ओर अग्रसर : 

 1: जीवन का उद्देश्य निर्धारित करें

यदि आपने अभी तक जीवन का उद्देश्य निर्धारित नहीं किया है, तो आज ही, इसी समय कर लें। उद्देश्यहीन जीवन व्यर्थ है। एकाग्रचित्त होकर केवल परमात्मा की ओर बढ़ें। जीवन की प्रत्येक क्रिया और प्रत्येक संकल्प केवल उन्हीं के लिए समर्पित हो।

 2: परमात्मा की ओर यात्रा

याद रखें, आप परमात्मा की ओर यात्रा कर रहे हैं। रास्ते की बाधाओं से विचलित न हों, कठिन परिस्थितियों से हार न मानें। आपके साथ एक महान शक्ति है जो आपकी रक्षा कर रही है।

 3: परमात्मा का अनुभव

अनुभव करें कि आपको एक महान प्रकाश घेर रहा है। यह आपके अंदर-बाहर, आगे-पीछे और नस-नस में व्याप्त हो रहा है। अपने ज्ञान, शक्ति और सत्ता को उसमें डुबो दें। जब आप व्यवहार में उतरेंगे, तो आपके जीवन में एक नवीन स्फूर्ति और उल्लास का अनुभव होगा। आप देखेंगे कि आपका जीवन प्रत्येक क्षण परमात्मा की अधिकाधिक सन्निधि में जा रहा है।

 4: सदैव परमात्मा के साथ

यह जान लें और सिद्धांत रूप से मान लें कि ऐसा एक भी क्षण नहीं हो सकता, जिसमें आप परमात्मा में स्थित न रह सकें। चाहे आप किसी भी परिस्थिति में हों, भगवान आपके साथ हैं और आपकी सहिष्णुता एवं धैर्य को देखकर मुस्करा रहे हैं। क्या आप उनके सामने क्षुब्ध या विचलित हो सकते हैं?

 5: वर्तमान क्षण का सदुपयोग

जिस परिस्थिति में आप इस समय हैं, वह उन्हीं प्रभु का मंगलमय वरदान है। इसमें उनके सुकोमल स्पर्श का अनुभव करें। देखो, इस समय भी उनके कर कमलों की छत्र-छाया आपके सिर पर है।

 6: भूत और भविष्य को छोड़ वर्तमान पर ध्यान दें

जो बीत गया, उसे भूल जाओ। जो आने वाला है, वह आपके अधिकार के बाहर है। आप केवल वर्तमान को सुधारें, कहीं यह क्षण व्यर्थ न बीत जाए। अनुभव करें, आज आपका दिन सार्थक बीत रहा है। आप भगवान की ओर बढ़ रहे हैं।

 7: परम सत्य का अनुभव

जो परम सत्य है, काल जिसका स्पर्श नहीं कर सकता, जो परम पवित्र है, किसी भी प्रकार की मलिनता से जो अछूता है, जो परम ज्ञानमय है, अज्ञान का लेश भी जिसमें नहीं है, वह तत्त्व जो "सत्यं शिवं सुन्दरम्" है, चारों ओर फैला हुआ है। जीव के रूप में, जगत् के रूप में वही प्रकट हो रहा है, मैं उसी में डूब-उतरा रहा हूँ।

 8: विषमताओं पर विजय

जो विषमताएं आपके सामने हैं, जिनमें आप उलझ रहे हैं, जिनके बारे में आप अनुभव करते हैं कि इनकी जटिलता असीम है, वे कुछ नहीं हैं। आप परमात्मा के सनातन अंश हैं, उनके स्वरूप हैं। ऐसी कोई शक्ति नहीं जो आपको बाँध सके। आप स्वतंत्रता से, परमात्मा की शक्ति का आश्रय लेकर आगे बढ़ें। सफलता अवश्यम्भावी है।

 9: सब कुछ परमात्मा का स्वरूप

ध्यान रहे, जो कुछ भी आप देख रहे हैं, यह परमात्मा का ही स्वरूप है। आपके हृदय की मलिनता, अश्रद्धा या भ्रांति से ही यह भिन्न रूप में प्रतीत हो रहा है। इसलिए क्रिया की तो बात ही क्या, संकल्प से भी किसी का तिरस्कार मत करो। जो आपके सामने आए, उससे इस प्रकार का व्यवहार करें मानो परमात्मा ही है वो 

10: प्रेम और आत्मसमर्पण

जो कुछ परमात्मा की ओर से आये, प्रेम से उसका स्वागत करो। चित्त में अपनी ओर विचारों को न ठूंसकर - चित्त के उद्गम में से उन्हें उभरने दो। तुम्हारा एक-एक विचार परमात्मा का सन्देश लायेगा। देखो तो सही, तुम्हारे हृद्देशस्थित परमात्मा क्या कहते हैं।

11: निष्कर्ष: परम शांति की प्राप्ति

निरंतर आत्मसमर्पण और प्रेम के मार्ग पर चलते हुए, आप धीरे-धीरे यह अनुभव करने लगेंगे कि आपका व्यक्तिगत अहंकार विलीन हो रहा है और आप परमात्मा के साथ एक हो रहे हैं। यही परम शांति और आनंद की अवस्था है, यही जीवन का वास्तविक उद्देश्य है।

याद रखें: यह यात्रा कठिन हो सकती है, लेकिन दृढ़ निश्चय और समर्पण के साथ, आप निश्चित रूप से अपने लक्ष्य तक पहुंचेंगे। परमात्मा सदैव आपके साथ हैं, आपका मार्गदर्शन कर रहे हैं।

शांति और प्रेम से रहें।