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दुःख और सुख का चक्र:

 दुःख और सुख का चक्र:

जीवन में सुख और दुःख का आना-जाना लगा रहता है। एक सिक्के के दो पहलूओं की तरह, ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। दुःख आने पर घबराएं नहीं, बल्कि उसे सहजता से स्वीकार करें। वहीं, सुख आने पर भी उछलें नहीं, क्योंकि यह हमेशा नहीं रहता। किसी भी व्यक्ति या परिस्थिति से अत्यधिक लगाव न रखें। खुशियों का आनंद लें, लेकिन उसमें डूबें नहीं। परिस्थिति कैसी भी हो, उसे स्वीकार करें और आगे बढ़ें।
समय का सदुपयोग करें:
समय किसी के लिए नहीं रुकता। यह अमूल्य है, इसलिए इसका सदुपयोग करें। जो करना है, उसे टालें नहीं, बल्कि तुरंत कर डालें। क्योंकि हो सकता है कल का कोई भरोसा न हो और वह अवसर फिर कभी न मिले।
जीवन का मार्ग चुनना:
जीवन में सफलता पाने के लिए एक लक्ष्य का होना जरूरी है। वैसे ही, जीवन जीने का भी एक मार्ग चुनना होता है। आमतौर पर दो रास्ते होते हैं - भक्ति और धर्म। आप अपनी आस्था के अनुसार किसी एक को चुन सकते हैं। लेकिन चुनाव करने के बाद उस पर दृढ़ रहें। पूर्णता प्राप्त करने के लिए अपनी इच्छाओं का त्याग करना पड़ सकता है। दोनों रास्तों में सफलता का मूल मंत्र है - समर्पण।
सेवा का भाव:
दूसरों की मदद करने में संकोच न करें। अपने आस-पास के लोगों की यथासंभव सेवा करें। किसी भी चीज की अपेक्षा किए बिना मदद का हाथ बढ़ाएं। आपका यह निस्वार्थ भाव न केवल दूसरों को खुश करेगा, बल्कि आपको भी आत्मिक संतुष्टि देगा।
शरीर और आत्मा का संतुलन:
धर्म के नाम पर कभी भी अपने शरीर को कष्ट न दें। संतुलित जीवन के लिए शरीर और आत्मा का संतुलन जरूरी है। सभी के साथ प्रेम और सद्भाव से रहें। याद रखें, प्रेम ही जीवन का आधार है। प्रेम है तो जीवन में सब कुछ हासिल किया जा सकता है।
कर्म और विचार:
आप जैसा बनना चाहते हैं, वैसा ही सोचें। सकारात्मक विचार सकारात्मक परिणाम लाते हैं। अपने विचारों और कर्मों पर ध्यान दें।
खुशियाँ बाँटें:
अपने पास खुशियों का खजाना इकट्ठा न करें, बल्कि उसे बाँटें। जो भी आपके संपर्क में आए, उसे खुशियां बांटकर विदा करें। दुःख को कभी स्वीकार न करें, क्योंकि हर दुःख के बाद सुख जरूर आता है।
पाँच जीवन मंत्र:
शरीर से सेवा और परिश्रम करें।
इन्द्रियों पर नियंत्रण रखें।
मन में सभी के लिए सद्भाव रखें।
हर काम सोच-समझकर करें।
कभी भी किसी बात का घमंड न करें।
क्रोध पर विजय:
क्रोध आपका शत्रु है। जो लोग आपकी इच्छाओं में बाधा डालते हैं, उन पर क्रोध करने से बचें। किसी भी उपाय से उन्हें समझने की कोशिश करें और उनसे मित्रता करें। क्रोध की जगह क्षमा और शांति को अपनाएं।
जीवन की सफलता:
पवित्र जीवन, ईश्वर का भजन और सदैव प्रसन्न रहना - ये सच्चे जीवन की सफलता के सूचक हैं। दूसरों को सुखी करने का प्रयास करें और खुद भी खुश रहें।
दुःख आने पर घबराएं नहीं, सहजता से स्वीकार करें। सुख आने पर भी उछलें नहीं, क्योंकि वो स्थायी नहीं होता।
किसी भी व्यक्ति या परिस्थिति से अत्यधिक लगाव न रखें।
सुख का आनंद लें, पर उसमें डूबें नहीं। दुःख से घबराएं नहीं, उसे भी सहजता से स्वीकार करें।
जो आता है उसे स्वीकार करें और जो जाता है उसे जाने दें।
समय का सदुपयोग:
समय बहुत कम है, इसलिए जो करना है वो फ़ौरन कर लें।
कल का कोई भरोसा नहीं, हो सकता है अवसर फिर न मिले।
भक्ति और धर्म:
जीवन में दो रास्ते हैं - भक्ति और धर्म।
किसी एक में से किसी एक को चुनना होगा और उस पर पूर्ण निष्ठा रखनी होगी।
पूर्णता प्राप्ति के लिए अपनी इच्छाओं का त्याग करना होगा।
दोनों रास्तों में इच्छाओं का कोई स्थान नहीं है।
कह सकते हैं कि पूर्ण समर्पण के बाद 'इच्छा' नाम की कोई चीज ही नहीं रहती।
सेवा:
अपने आसपास के लोगों की यथासंभव सेवा करें।
बदले में किसी भी चीज की अपेक्षा न रखें।
आपका कर्म स्वावलंबन को बढ़ावा दे।
धर्म और शरीर:
धर्म के नाम पर शरीर को कष्ट न दें।
सभी के साथ प्रेम और सद्भाव से रहें।
प्रेम ही जीवन का सच्चा सुख है।
यदि प्रेम है तो सब कुछ प्राप्त है।
सोच और कर्म:
जैसा बनना चाहते हैं, वैसा ही सोचें।
सकारात्मक सोच सकारात्मक परिणाम लाती है।
सुख-दुःख का चक्र:
संसार में कोई भी ऐसा नहीं है जिसे हमेशा दुःख ही दुःख मिला हो,
और न ही कोई ऐसा है जो सदैव सुखी ही रहा हो।
दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आता है।
दुःख के बाद सुख और सुख के बाद दुःख आता है।
खुशियों का खजाना:
अपने पास खुशियों का खजाना होना चाहिए।
जो भी आपके संपर्क में आए, उसे खुशियां बांटकर विदा करें।
दुःख को कभी स्वीकार न करें।
सभी दुःखों का अंत सुख ही होता है।
पता नहीं, कौन सा दुःख किस सुख की भूमिका निभाए!
पाँच अनमोल बातें:
शरीर से सेवा और श्रम करें।
इन्द्रियों पर यथासंभव नियंत्रण रखें।
मन में सभी के प्रति सद्भावना रखें।
बुद्धि से सोच-समझकर काम करें।
कभी भी किसी बात का घमंड न करें।
क्रोध का प्रबंधन:
जिनके कारण आपकी इच्छाओं में बाधा आती है, उन पर क्रोध न करें।
किसी भी उपाय से उन्हें संतुष्ट कर उनसे मित्रता कर लें।
मनुष्य जीवन की सफलता:
पवित्र जीवन, भगवान का भजन और सदैव प्रसन्न रहना - ये मनुष्य जीवन की सफलता के सूचक हैं।
सुखी रहें और दूसरों को भी सुखी करें।
हृदय का प्रभाव:
अपने हृदय को इतना मीठा बना लें कि आस-पास के सभी मीठे हो जाएं।
मुस्कराकर बोलें, कोमलता से व्यवहार करें और सभी को सुख दें।
जिससे सुख मिलता है, उसे सभी प्यार करते हैं।
दुःखी पर दया तो आती है, उससे प्रेम नहीं होता।
अपने को सुखरूप रखें, जिससे सब आपको प्यार दें।

स्वामी श्री अखण्डानंद

स्वामी श्री अखण्डानंद