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Ceiling on Desires : अपनी लाइफ को उम्मीदों के बोझ से बचाएं

Ceiling on Desires : अपनी लाइफ को उम्मीदों के बोझ से बचाएं .. P अतुल विनोद 



हजार ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले.. P ATUL VINOD 

 

Over coming your desires and gaining self control

 

ख्वाहिशों की फेहरिस्त लंबी है|  बचपन से लेकर अब तक न जाने कितनी इच्छाएं पैदा हुई उनमें से कुछ पूरी हुई कुछ पूरे हुए बिना ही खत्म हो गई|
जब छोटे थे तब की इच्छाओं और अब की कामनाओं में जमीन आसमान का अंतर है|
छोटे थे तो चाह थी आसमान को छू लेने की|  या तो ख़्वाहिशें इतनी बड़ी होती थी कि जिनका पूरा होना संभव ही नहीं था|  चांद को पकड़ लूं,  सितारों की सैर कर लूं,  सूरज से मिल आऊं| उड़ने लगूं, और इस विश्व की आखिरी दीवार तक पहुच जाऊं|  खुली आंखों से उड़ना संभव नहीं होता तो रात को सोते वक्त बच्चा ख्वाब में उड़ लेता है| 

 

“I count him braver who overcomes his desires than him who conquers his enemies; for the hardest victory is over self.” — Aristotle

 

कैसी कैसी इच्छाएं थी|  या तो  इतनी छोटी कि सहज ही पूरी हो जाए|  लेकिन सक्षम नहीं थे, मोहताज़ थे … काश उसके पास वाला खिलौना मेरे पास भी होता? काश मेरे पास भी वैसी ही साइकिल होती जैसी राजू के पास है| काश आज स्कूल की छुट्टी हो जाती| स्कूल में (दोपहर में) काश गाँव में कोई निपट जाता तो आधे दिन की छुट्टी हो जाती | बाल मन है उसे नहीं मालूम किसी के मरने का दुःख क्या होता है| उसे तो अपना सुख अच्छा लगता है| 

 

The end of desire is the end of sorrow

 

बचपन के सुख की डोर छोटी-छोटी इच्छाओं से बंधी होती है| 
छोटी  इच्छाओं की पूर्ति जो सुख देती है उसका वर्णन नहीं हो सकता|  कई इच्छाएं पूरी होती है कई अधूरी रह जाती है लेकिन समय बढ़ता चला जाता है|
साल दर साल इच्छाओं का फ्लेवर बदलता चला जाता है|
तरुणाई की इच्छाएं कुछ और होती है, युवावस्था की कुछ और | 
हर एक की इच्छाएं उसकी परवरिश, माहौल, और परिस्थिति पर निर्भर करती हैं| 
इच्छा पूरी नहीं हुई तो बच्चा उसे भूल जाता है लेकिन जैसे-जैसे बड़ा होता है इच्छा पूरी ना होने पर तकलीफ़ बढ़ती चली जाती है|
एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी खड़ी हो जाती है|  एक मरती है तो दूसरी जाग जाती है| 
ये नहीं तो वो मिल जाता| 

 

रोजमर्रा की अलग ख्वाहिश है,  जीवन-शैली से जुड़ी हुई इच्छाएं हैं,  दिल के अरमां हैं तो मन की मुरादें हैं| 
कितनी ख्वाहिश है लेकिन वक्त उतना नहीं है|  अधूरी तमन्नाओं को पूरा करने में उम्र बहुत छोटी पड़ जाती है| 
इच्छाओं को दुख का सबसे बड़ा कारण माना जाता है|  लेकिन इच्छाओं के बिना जिया भी नहीं जा सकता| 
दृष्टि बदलने से दृष्टिकोण बदल जाता है|
इच्छाओं का क्या है|  चाहो तो इनका ढेर खड़ा कर दो|  और ना चाहो तो पल भर में मुक्त हो जाओ| बस दृष्टिकोण बदलने की जरूरत है|  
इनके ढेर पर खड़े होकर जिंदगी बोझिल हो जाती है| अरमानों के आगे दुनिया  छोटी पड़ जाती है| 
इसलिए  ख्वाहिशें कम से कम पाली जाए|  अपनी तमन्नाओं को प्रकृति के हवाले कर दिया जाए| 
जियो तो ऐसे कि भरे बाजार से खाली हाथ लौट आओ 
मुरादों की भीड़ मन को अशांत कर देती है| अपेक्षाओं का बोझ रिश्ते को बोझिल बना देता है| 

 

न खुद पर इच्छाओं का भार डालो, दुसरे से भी अपेक्षाओं का बोझ उतारो| 
बेफिजूल की इच्छाएं और अपेक्षाएं दुख दर्द का बड़ा कारण हैं| 
बेलगाम ख्वाहिशें, न जाने कहां कहां भागती हैं, जिंदगी को रोंद्ती हैं, मन की शक्तियों को उलीचती हैं| 
इतिहास गवाह है कि ख्वाहिशों ने बादशाहों को भी गुलाम बना दिया|  और जिसने ख्वाहिशों को छोड़ दिया वो गुलाम होकर भी बादशाह बन गया|
उम्मीदें इच्छाएं और तमन्नायें इन्सान को जीने नहीं देती लेकिन हम हैं कि इन्हें मरने नहीं देते|
उम्मीदों की बुनियाद पर खड़ा प्रेम भी ज़हर बन जाता है| अपेक्षाओं से रहित प्रेम कष्टों के तूफान और तकलीफों की बारिश में भी सुकून की नींद सोता है|
हम भगवान् से दूर हैं क्योंकि उससे तो हम सिर्फ मांगते ही रहते हैं|  
हमारी उम्मीदों अपेक्षाओं इच्छाओं से लदा हुआ भगवान कैसे हमे  दिखाई देगा?
चेष्टाओं की डोर से बंधी जिंदगी, चाह की प्यास को बढ़ाते बढाते अतृप्त होकर जीवन मरण के बंधन में बांध जाती है| 
हम ये जानने के बाद कि इच्छाओं के न होने से हम सुखी हो सकते हैं तो हम इच्छामुक्त होने की ख्वाहिश पाल लेते हैं| 
इच्छाओं से मुक्त होने का अर्थ है –मोक्ष, कामना रहित होने की भी इच्छा न रखना 
इच्छाए रखना भी हो तो इतनी ही रखें जितनी ज़रूरी है| 
इच्छाओं में भी “अपरिग्रह” कम से कम|