शक्ति पात अलग है और गुरु दीक्षा अलग , गुरु दीक्षा एक परम्परा और संस्कृति है| भौतिक और अध्यामिक दो मार्ग हैं| दोनों में उन्नति के लिए दीक्षा की परंपरा है|
अध्यात्म में दीक्षा रुपी परम्परा फलदायी नहीं यदि शिष्य में जिज्ञासा, पात्रता, मुमुक्ना नहीं और वो गुरु जिसकी शक्ति उद्बोधित और क्रियाशील नहीं तक शक्ति का सञ्चालन कैसे होगा|
अध्यात्म पथिक रस्म दीक्षा से दूर रहें|
शक्तिपात यानी शक्ति का अनुग्रह , ये अनुग्रह पात्रता विकसित होते ही हो जाता है| पात्रता का विकास कई कारकों पर निर्भर करता है|
अनुग्रह स्वयं शक्ति के द्वारा भी हो सकता है, अनुग्रह आपके पूर्वजन्म के गुरु, अद्रश्य लोक में रहने वाले सिद्धयोगी, परमपद प्राप्त सिद्धात्मायें भी इश्वर के आदेश से अनुग्रह कर सकती हैं|
सिद्ध समर्थ योगी भी सभी को शक्तिपात नहीं कर सकता, कर भी दे तो शिष्य उसका लाभ नहीं उठा पाता, भ्रम में पड़कर राह बदल देता है|
शक्ति के अनुग्रह से साधक ऐसे गुरु तक पहुचा दिया जाता है जिसके माध्यम से उसकी शक्ति उद्बोधित हो जाए, सब कुछ इश्वर की कृपा से ही घटित होता है|
शक्ति चाहे तो आपात्र गुरु से भी पात्र शिष्य का कल्याण करवा सकती है|
इसका उदहारण ऐसे कथित संत हैं जो जेल में हैं लेकिन उनके कई शिष्य शकर बन गये| ईश्वर आपका भाव समझता है इसलिए पत्थर के माध्यम से भी कृपा कर देता है
सृजन और विसर्जन दोनों उसके ही कार्य हैं| नालायक में भी वही है उसी का खेल एक को लायक बना देता है दूसरे को नालायक|
इसलिए अपने भाव पवित्र रखा जाए, कहते हैं कि जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत तिन देखी तैसी|
यदि किसी ने आध्यात्म के नाम पर आपको ठगा है तो ये भी आपकी ही नियति थी|
मन चंगा तो कठोती में गंगा, यदि मन साफ़ है, आपमें पात्रता है तो आप ठगे नहीं जा सकते आपको या तो सही मार्गदर्शक मिलेगा या आप गलत से भी वही प्राप्त करेंगे जिसकी आपकी योग्यता है|
संयोग बनता है तो सब सार्थक हो जाता है|
संयोग कुछ नहीं वो "स्कोर" है जो शक्ति के उद्बोधन के लिए चाहिए, ये एक तरह का "कट-ऑफ-मार्क" है जिस तक पहुचते ही सब सहज हो जाता है| समर्थ गुरु के सामने भी अपात्र शिष्य कुछ प्राप्त नहीं कर पाते|
गुरु भी उसे मंत्र या साधना करते रहने का बोलता है|
जब तक दोनों की फ्रीक्वेंसी मैच नहीं होगी काम नहीं बनेगा|
पात्रता परिश्रम साध्य नहीं समर्पण साध्य है|
अभिमान रहित आगे बढ़िए कल्याण होगा|
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