ध्यान साधना यूं तो बहुत सामान्य विषय बन गया है, लेकिन इसकी गहराइयों में उतरने वाले कई तरह के सवालों से गिर जाते हैं? ध्यान साधना का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि ध्यान किसका करें? ध्यान हमेशा उस संपूर्ण परमात्मा का होना चाहिए| वह परब्रह्मा, जो परिपूर्ण है, संपूर्ण है, सर्वव्यापी है, सर्वज्ञ है,अंतर्यामी है, घट-घट के वासी है, अखंड मंडलाकार, ज्योतिर्मय है, परम पवित्र है|
जो सबके अंदर है और जिसमें सब समाहित हैं| हमारी उपासना का आधार वही है वही साध्य है वही उपास्य है| अपूर्ण का ध्यान करने से अपूर्णता प्राप्त होगी लेकिन पूर्ण का ध्यान करने से पूर्णता प्राप्त होगी| हम जिस शांति की तलाश रूप रंग में करते हैं वह हमारे अंदर ही है| हम खुद ही शांति हैं, हम स्वयं आनंद, सुख, समृद्धि, वैभव, यश, और कीर्ति के स्रोत हैं| जब स्रोत अंदर है तो उसकी तलाश बाहर क्यों?
उस कल्याणकारी परम पिता की प्राप्ति के लिए उसके प्रति समर्पित होना पड़ेगा| जब तक गहरी प्यास नहीं तब तक उसकी तलाश शुरू नहीं होगी| तड़प और विरह में जलता साधक ही उस साध्य तक पहुंच सकता है| उपासना में एक दौर ऐसा आ जाता है जब साधक साधना और साध्य एक हो जाते हैं|
