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अमृत किस प्रकार प्राप्त हो सकता है ?

क्या अमृत कोई द्रव्य है जिसकी कुछ बूंद निगल लेने पर हम सदा के लिए अमर हो सकते हैं? जिसके पीने के बाद हमारा शरीर सदा सदा के लिए युवा बना रह सकता है| धरती पर क्या आपको कोई ऐसा प्राणी दिखाई देता है जो अमृत पीकर अजर अमर हो गया हो और सदियों से चिर युवा दिख रहा हो|
अमृत दरअसल कोई तत्व नहीं जो हमारे शरीर को नष्ट होने से बचा ले| अमृत पीने का अर्थ है उस परम सत्य पान कर लेना जो सबसे पहले हमें शरीर के बोध से ऊपर उठाकर आत्मबोध तक पहुंचा दे| आत्मबोध परमात्म बोध रूपी अनंत समुद्र का हिस्सा बन जाए|
एक सामान्य मनुष्य की दौड़ सुख की खोज तक होती है| पूरी लाइफ निकलने के बाद भी यह दौड़ चलती रहती है| आपने उम्र दराज लोगों को भी देखा होगा | वो कुछ ऐसा चाहते हैं जिससे उनकी बच्ची-खुची जिंदगी सुख से बीते| हर उम्र का व्यक्ति आपको सुख की तलाश करता दिखाई देगा| हर तरह का व्यक्ति चाहे वो राजनेता,व्यवसाई या नौकरी पेशा हो “और” बेहतर की कामना करते हुए दिखाई देगा |
“और बेहतर” की इच्छा का अर्थ है कि वह नहीं मिला जिसकी तलाश थी| वह अंत तक भी नहीं मिलता, मृत्यु के समय भी यही अफसोस होता हैकि पूरी जिंदगी निकल गई लेकिन फिर भी कुछ कमी रह गई|
हमारी सुख की खोज कहां तक है? सामान, संसाधन, पैसे,पद, प्रतिष्ठा, रसूख, ताकत या रौब में ?
जिसको बड़ा पद और पैसा मिल गया क्या वह सुखी हो गया? जैसे कि किसी देश का प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या सबसे बड़ा बिजनेसमैन?
इनमें से किसी एक की भी छवि आप अपने जेहन में लेकर आइए|
यदि वो व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री है तो आपको लगेगा कि ये कितनी तरह की चुनौतियों से घिरा हुआ है, आलोचना, वायदे पूरे करने की चिंता, वोट बटोरने की चिंता, नित नए होने वाले चुनावों को जीतने की, पार्टी को एकजुट रखने की चिंता, और यह सब करने के लिए खुद को स्वस्थ रखने की चिंता, इसके बाद एक और ख़्वाहिश ये सारी जिम्मेदारियां पूरी हो जाए तो मैं थोड़ा सुकून व शांति से बैठ सकूं| अपने लिए कुछ वक्त निकाल सकूं|
इसी तरह से बिजनेसमैन आपको दौड़ भाग करता हुआ दिखाई देगा| पहले भी न जाने कितने बिजनेसमैन टॉप पर पहुंचे फिर अचानक नीचे गिरे और मौत हो गई| कितने ही राजनेता आए शिखर पर पहुंचे आज वो केवल तस्वीरों में दिखाई देते हैं|
हर व्यक्ति अपने अंतिम लक्ष्य यानी सुख शांति और आनंद की प्राप्ति से पहले ही इस दुनिया से विदा हो जाता है|
कोई भी चीज जो हमें मिलती है कुछ समय बाद हमसे जुदा हो जाती है| थोड़ी देर के लिए उससे सुख का अहसास होता है| अच्छी परिस्थिति भी बुरी में बदल जाती है| अच्छा खासा हट्टा-कट्टा स्वस्थ दिखने वाला व्यक्ति भी अचानक बीमार पड़ जाता है|
इस दुनिया में कोई भी हमेशा के लिए युवा नहीं रह पाया| जिन देवताओं और राक्षसों ने अमृत का पान कर भी लिया वो भी आज हमें दिखाई नहीं देते|
इसका मतलब ये है कि अमृत कोई द्रव्य नहीं है| अमृत व्यक्ति को सुख की छाया से मुक्त दिलाने वाला एक कारक है|
अब सवाल उठता है किस सुख की छाया से मुक्त होने से क्या मिलेगा?.... छाया से मुक्त होने से शाश्वत सुख मिलेगा|
शाश्वत सुख की प्राप्ति के लिए अमृत रूपी कारक की आवश्यकता होगी|
वो अमृत कैसे मिलेगा जिससे मानव सुख की छाया से मुक्त हो जाए और शाश्वत सुख प्राप्त हो जाए?
अमृत की प्राप्ति के लिए हमें साधना करनी पड़ेगी, लेकिन इस साधना से तो कई भक्तों को दुख मिलता है?
दरअसल दुख सहन करना भी साधना का ही एक हिस्सा है| साधक दुख को भी सुख बना लेता है| उसके दुख दूसरों को दिखते भी हैं लेकिन उसे अपने अंदर आनंद की किरण नजर आने लगती है|
जब भी अंदर की साफ सफाई करनी होती है| घर की साफ सफाई करनी होती है तो कचरा इकट्ठा करके बाहर फेंकने में कुछ तकलीफ तो होती है| यह प्रक्रिया का एक हिस्सा है|
अब सवाल उठता है कि साधना क्या है?
साधना का अर्थ है वासनाओं और संस्कारों को जड़ से मिटा कर मन को निर्मल करना| अविद्या, अज्ञान, अस्मिता, मैं, अहंकार, दुख-सुख जैसे आवरणों को हटाकर प्रारब्ध को छय करना|
प्रारब्ध को तो भोगना ही पड़ता है लेकिन प्रारब्ध के परिणामों को भी खुशी खुशी भोगते हुए, कर्तव्य और कर्म करते हुए अपनी स्थिति को शरीर से उठाकर आत्मा में स्थापित कर देना|
यूं तो साधना की अनेक पद्धतियां हैं लेकिन मूल साधना है अंतर-जगत में स्थित उस शक्ति को जागृत कर देना जो आपके भौतिक, सूक्ष्म और कारण शरीर के आवरणों/ पर्दे हटा कर परम ज्योति स्वरूप तक की यात्रा तक खुद आगे ले जाए|
हम दो तरह की साधना करते हैं| बाहरी साधना धीरे-धीरे हमें अंदर की ओर ले जाती है| अंदर भी साधना के दो स्तर है एक अभिमान-सहित एक अभिमान-रहित|
जो साधना अभिमान सहित की जाती है यानी जिसमें मैं और मेरे का भाव रहता है| जैसे ध्यान,जप,पूजा,पाठ,दान,पुन्य आदि| ऐसी साधनाएं जो हम खुद करते हैं तो उसमें करने का भाव रहता है| एसी साधना हमारे चित्त पर अपने संस्कार संचित कर देती है| कहाँ तो संस्कार मिटने थे यहाँ नए निर्मित हो गए|
जो साधना अभिमान रहित होती है वह कोई नया संस्कार निर्मित नहीं करती| अभिमान रहित साधना तब होती है जब अंतर शक्ति-जागृत होकर स्वयं साधन कराती है| तब करने का भाव नहीं रहता, क्योंकि उस वक्त साधना आप नहीं कर रहे होते बल्कि स्वयं परमात्मा की चैतन्य शक्ति कराती है| अंतर जागृत कुंडलिनी शक्ति स्वयं योग क्रियाओं व ध्यान कराकर, संस्कारों से व्यक्ति को निर्मल करती है, यही वास्तविक अध्यात्म की यात्रा है| इसी को शक्ति की अंतर्मुखी यात्रा कहते हैं|