हमारा मन बेहद शक्तिशाली है दरअसल हमारा मन ईश्वर या मन का ही एक छोटा हिस्सा है इसीलिए एक मनुष्य अपने मन में कुछ पैदा करने खोजने बनाने का संकल्प लेता है तो एक समय बाद पूरा हो जाता है किसी व्यक्ति ने मोबाइल बनाने का संकल्प लिया और अपने मन में उसका एक चित्र तैयार किया धीरे-धीरे वह साकार हो जाता है जितनी भी वस्तुएं आज दिखाई दे रही हैं वह सब मन के संकल्प का ही एक रूप है सबसे पहले यह मन में विचार के रूप में आई विचारों में घनीभूत होकर संकल्प का रूप लिया और संकल्प ने घनीभूत होकर वस्तु के रूप में स्थान ले लिया इसीलिए मन को बेहद शक्तिशाली माना गया है कहते हैं कि यह पूरी दुनिया ईश्वर के मन का संकल्प ही है सबसे पहले इक्छा ज्ञान के मेल से क्रिया आप कोई भी भावना कीजिए और उस भावना के साथ अपना पूरा ध्यान लगा दीजिए धीरे-धीरे वह भावना सगन होने लगेगी घनीभूत होने लगेगी और विचार के रूप में पैदा हुए परमाणु धीरे धीरे मिलते हुए भावना का रूप लेंगे भावनाओं के परमाणु धीरे धीरे वस्तु का रूप लेने लगेंगे
मनुष्य का मन बेहद शक्तिशाली लेकिन मन की भी मन से भी शक्तिशाली है प्राण प्राण ही काल है प्राण ही समय समय की तरह प्राण भी गतिशील समय हर जगह व्याप्त है लेकिन इसी तरह प्राण भी हर जगह व्याप्त है हमारे शरीर में भी प्राण ही व्याप्त है यही पुराण हमारी जिंदगी का वाहक है शरीर से जब प्राण निकल जाता तो शरीर नष्ट हो जाता है मृत्यु हो जाती है लेकिन यदि प्राण पर अधिकार कर लिया जाए तूफान की गति रुक जाती और प्राण की गति रुक जाती है तो शरीर की वृद्धि की दर भी घट जाती है और मनुष्य लंबे समय तक जवान बना रहता है जिसने प्राणपुर पूरी तरह अधिकार कर लिया तो समझिए उसने काल पर समय पर अधिकार कर लिया और ऐसा व्यक्ति लंबे समय तक मृत्यु पर भी विजय रख सकता है
हमारे अस्तित्व के तीन प्रमुख तन है शरीर मन और आत्मा प्राण ऊर्जा है जो शरीर कुर्ता कर देती है शरीर को चलाएं मान रखती हैं गतिशील रखती प्राण को काबू में कर लिया जाए तो शरीर को लंबे समय तक युवा बनाए रखा जा सकता है लेकिन मन अपनी गति से वरिष्ठ होता चला जाता है क्योंकि मन और प्राण का सीधा प्रभाव नहीं पड़ता प्राण शरीर को प्रभावित करता है लेकिन सीधे तौर पर मन को नहीं प्राण ही समय है इसलिए प्राण शरीर की वृद्धि दर को तो धीमा कर सकता है लेकिन मन को सीधे तौर पर प्रभावित नहीं करता आत्मा शरीर मन और प्राण तीनों से ही प्रभावित भी रहती है और अप प्रभावित
शरीर एक दूरी है इस दूरी के आसपास आत्मा मन और प्राण घूमते रहते हैं शरीर में ही आत्मा का निवास होता है और प्राण शरीर को चलाने वाली दैवीय शक्ति है मन आत्मा और शरीर के अनुभवों से उत्पन्न विचारों का भावनाओं का स्मृतियों का समुच्चय जिसके अंदर कल्पना शक्ति विचार शक्ति मनन शक्ति होती है
मनुष्य के अंदर तीन प्रमुख शक्तियां काम करते हैं पहली सकती है प्राण शक्ति दूसरी शक्ति है मन की तीसरी शक्ति है आत्मा शक्ति. योग में इन तीनो शक्तियों के मेल को चित्र शक्ति कहा जाता है और चित्र शक्ति के विरोध को ही योग कहा जाता है
जब तक हमारे शरीर के अंदर यह चित्र शक्ति मालूम है तब तक हम जीव हैं और जैसे ही यह चित्र शक्ति हमारे शरीर से बाहर गई वैसे ही हम निर्जीव हो जाते हैं
इसी तरह प्राण तत्व तत्व और आत्म तत्व मिलकर अध्यात्म का निर्माण करते हैं यानि चित्ती तत्व ही अध्यात्म तत्व है
Chitt को ही चेतना कहा गया है
चेतना की सात अवस्थाएं जागृति सुषुप्ति स्वप्न, वैश्विक , भागदीय और ब्राह्मी
जीवात्मा (जागृति , सुसुप्ति, स्वप्न) , आत्म (तुरीय ) , शुद्धत्मा, विशुद्धतमा , दिव्यत्म
जागृति जिसमें शरीर , चेतन मन , आत्मा और प्राण क्रियाशील होते हैं चेतन के अतिरिक्त मन के अन्य भाग सुप्त रहते हैं , चेतन मन के साथ इंद्रिया जुड़ी हुई हैं विषय जुड़े हैं
स्वप्न जिसमें मन का एक भाग चेतन मन सो जाता है और अवचेतन जागृत हो जाता है यहां शरीर सो रहा होता है और इन्द्रियाँ अर्ध जागृत होती हैं
तीसरी अवस्था है सुषुप्ति की अवस्था यह वह अवस्था होतीहैं जिसमें विचार करने की क्षमता सोचने की क्षमता देखने की क्षमता सुनने की क्षमता और स्पर्श करने की क्षमता स्वाद लेने की क्षमता यह सारी क्षमता है सो जाती हैं यानी चेतन मन भी और अवचेतन भी ,उस वक्त ना हमें कोई भान होता है ना दिमाग में कोई चित्र होता है ना कोई आभास होता है यहां सिर्फ आत्मा जागृत रहती है मन के अचेतन और सुपर व ब्रह्म चेतन जागृत रहते हैं वह सुप्त अवस्था कहलाती है
पहला अवस्था के बाद जैसे हम सोते हैं तो सोने के बाद जब हम जाते हैं तो हमें पता नहीं रहता कि जिन जिस समय में हम गहरी निद्रा में थे तब हमारे साथ क्या-क्या हो रहा था स्वप्न से परे की अवस्था पूरी तरह से जड़ अवस्था होती है जिसमें समय का कोई आभास नहीं होता घंटों कैसे निकल जाते हैं पता ही नहीं होता इस दौरान व्यक्ति जड़ हो जाता है उसकी चेतन नेता पूरी तरह खत्म हो जाती मन की गति थम जाती है आत्मा की गति जारी रहती व्यक्ति जीवित रहता है लेकिन मरे हुए के समान न कोई भाव न कोई विचार न कोई कल्पना ना कोई आभास ना कोई दृश्य यही अवस्था स्थाई रूप ले लेती है तो मृत्यु कहलाती और इसी अवस्था में व्यक्ति समाधि को प्राप्त होता है जिसे योग से प्राप्त किया जाए एक वक्त था वह है जो नैसर्गिक है नींद के रूप में हमें प्राप्त होती अवस्था वह है जो हम लोग बल से प्राप्त करते हैं और उस अवस्था में भी हम भाव विचार दृश्य मन के पार चले जाते हैं पर यह अवस्था समाधि की अवस्था कहलाती जाना विचार है यह भाव है 10 न स्पर्श है
सोने के बाद क्या सोने के बाद मनुष्य दिया तो जागेगा या फिर मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा नींद यदि कुछ घंटों की है तो इस बात की पूरी संभावना है कि व्यक्ति नींद के बाद जागृति की अवस्था में पहुंचे लेकिन नींद स्थाई बन जाए और कितना भी अनेक छोड़ कर चली जाए यही नींद बन जाती लेकिन व्यक्ति के बाद ना तो जागे ना मरे और तीसरी अवस्था में पहुंच जाएं
तो उसे जल समाधि की अवस्था कहते जल समाधि की अवस्था योग मार्गी को ही प्राप्त हो सकती बाकी सारे मनुष्य सोने के बाद या तो जागृत अवस्था में पहुंचेंगे या यदा-कदा सोई ही रह जाएंगे और मृत्यु की दशा में प्राप्त हो कर किसी नए जगत में प्रवेश कर जाएंगे यानी आत्मा शरीर से बाहर हो जाएगी तुरीय अवस्था एक और आगे एक और अवस्था है जिसे हम कहते हैं तो रियाद की अवस्था तुरिया अवस्था में अंसारी चीजों का अस्तित्व तुरिया तीन अवस्था में इंद्रिय मन डीएक्टीवेटेड हो जाते हैं और रह जाती है सिर्फ आत्मा की सत्ता आत्मा यानी सिर्फ जाने वाला तत्व और यह आत्मा इस अवस्था में विश्व से विश्व से सीधे संपर्क में आ जाती है आमतौर पर जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति की अवस्था में आत्मा को विश्व से संपर्क बनाने के लिए मन और इंद्रियों की जरूरत पड़ती है लेकिन योग मार्ग व्यक्ति जब तुरिया अतीत अवस्था में पहुंच जाता है तब आत्मा सीधे विश्व के साथ संपर्क बनाने लगती है यानी आत्मा के सिग्नल शतक और विश्व के सिग्नल आत्मा तक सीधे पहुंचने लगते डायरेक्ट कनेक्शन इससे पहले जो कनेक्शन था वह इंद्रियों के माध्यम से और मन के माध्यम से लेकिन तुरिया अवस्था में विश्व का और आत्मा का संबंध हो जाता है
अभी तक क्या होता था आत्मा को जो ज्ञान मिल रहा था वह उसका स्वयं देखा हुआ नहीं था वह ज्ञान उसे इंद्रियों के माध्यम से मिल रहा था जो मन और इंद्रियों के भावों और जाओ और विश्वास तंत्र के प्रभाव में आकर दूषित भी हो सकता है और मेला फाइट भी हो सकता है क्यों नहीं लेकिन जब आत्मा डायरेक्ट यूनिवर्स के कांटेक्ट में आ जाती है तब वह विश्व अतीत अवस्था को प्राप्त करती है और इसी को आत्मज्ञान की अवस्था में थे जब सब कुछ डायरेक्ट में लगता है अभी जो ज्ञान मिला था जो जानकारियां मिली थी उन जानकारियों और ज्ञान के मूल को आत्मा यहां पर सकती है देख सकती है उन्हें भी कर सकती है कि आखिर सत्य क्या है जो प्राप्त हुआ है उसमें सत्य क्या है मिलावट कहां है इसकी जानकारी बहुत अच्छे ढंग से
आत्मा मूल रूप में हर तरह के दोस्त दुर्गुण राग स्प्रे से परे है लेकिन शरीर मन इंद्रियां और विषय के साथ मिलकर यह अलग अलग अवस्थाओं से होकर गुजरने को मजबूर होती है जब हम जागते हैं तो आत्मा के साथ मन और शरीर इंद्रियां और विषय सब सक्रिय रहते इसलिए जागृत अवस्था में आत्मा ज्यादा होती है यादागिरी यदि
